श्री रामचन्द्र जी के पूर्वज सत्यवादी
हरिश्चन्द्र का नाम आज भी सम्मान से लिया जाता है । वे अपनी सत्यवादिता और
दानशीलता के कारण प्रसिद्व थे ।
देवताओं के कहने पर एक बार ऋषि
विश्वामित्र उनकी परीक्षा लेने आये । ऋषि ने स्वप्न में उनसे राज्य माँगा
। प्रातःकाल उठकर स्वप्न में देखे गये व्यक्ति को राजा ने अपना राज्य दे
दिया ।
विश्वामित्र ने दक्षिणा माँगी तो राजा ने कहा, मैं एक महीने
में आपको दक्षिणा दे दूंगा । उनकी पत्नी शैव्या ने कहा, आर्यपुत्र आप मुझे
बेचकर दक्षिणा दे दे । रानी को बेचकर आधी दक्षिणा का प्रबन्ध हुआ । इसके
बाद राजा ने श्मशान में जाकर चाण्डाल के हाथों अपने आपको बेचकर पूरी
दक्षिणा चुका दी ।
एक दिन उनके पुत्र रोहितशव को साँप ने काट लिया
। जिससे वह मर गया । शैव्या अपने मरे हुए पुत्र का दाह संस्कार कराने के
लिये अकेली श्मशान गयी । चाण्डाल के सेवक के रुप में वहाँ हरिश्चन्द्र
खड़े थे । उन्होंने शैव्या से दाह संस्कार के लिये आधा कफन लेना चाहा तो
विश्वामित्र अन्य देवताओं सहित वहाँ आ गये । वे राजा से कहने लगे हे राजन
तुम्हारी परीक्षा पूरी हो गयी । तुम दोनों धन्य हो अपना राज्य सँभालो ।
सब देवताओं ने उन्हें आर्शीवाद दिया जब तक पृथ्वी पर सूर्य और चन्द्रमा रहेंगे आपका यश तब तक संसार में जगमगाता रहेगा ।
जल छिड़ककर विश्वामित्र ने रोहिताश्व को जीवित कर दिया । चारो ओर महाराज हरिश्चन्द्र और महारानी शैव्या की जयजयकार होने लगी ।





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