एक किसान की एक दिन अपने पड़ोसी से खूब जमकर लड़ाई हुई। बाद में जब उसे अपनी गलती का अहसास हुआ, तो उसे ख़ुद पर शर्म आई।
वह इतना शर्मसार हुआ कि एक साधु के पास पहुँचा और पूछा, ‘‘मैं अपनी गलती का प्रायश्चित करना चाहता हूँ।’’
साधु ने कहा कि पंखों से भरा एक थैला लाओ और उसे शहर के बीचों-बीच उड़ा दो। किसान ने ठीक वैसा ही किया, जैसा कि साधु ने उससे कहा था और फिर साधु के पास लौट आया।
लौटने पर साधु ने उससे कहा, ‘‘अब जाओ और जितने भी पंख उड़े हैं उन्हें बटोर कर थैले में भर लाओ।’’
नादान किसान जब वैसा करने पहुँचा तो उसे मालूम हुआ कि यह काम मुश्किल नहीं बल्कि असंभव है। खैर, खाली थैला ले, वह वापस साधु के पास आ गया। यह देख साधु ने उससे कहा, ‘‘ऐसा ही मुँह से निकले शब्दों के साथ भी होता है।’’
इसलिए हमेशा अपने शब्दों को तौल कर बोलें । महान दार्शनिक कन्फ्यूसियस ने कहा है-‘शब्दों को नाप तौल कर बोलो, जिससे तुम्हारी सज्जनता टपके।‘ भारतीय दार्शनिक जे. कृष्णमूर्ति के अनुसार -‘कम बोलो, तब बोलो जब यह विश्वास हो जाए कि जो बोलने जा रहे हो उससे सत्य, न्याय और नम्रता का व्यतिक्रम न होगा।‘






8 comments:
जो कार्य महँगी ओषधियाँ नहीं कर सकती, वाणी की मधुरता एवं शाब्दिक विवेक सरलता से कर लेते हैं। सुमार्ग का वरण व्यक्ति इसी ओजवान वाणी को जानकर ही करता है, जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण है - श्रीमद् भगवद्गीता।
उल्लेखित कहानी द्वारा शब्दों का खूब सोच-विचार कर चयन करने एवं अत्यंत माधुर्य व एकाकार के भाव को हृदयांगम करके बात कहने और मंतव्य रखने की सीख बडे ही सरल शब्दों में दी गयी है।
कबीर जी ने खूब लिखा है:-
ऐसी वाणी बोलिये, मन का आपा खोय।
औरन को शीतल करे, आपहूं शीतल होय।।
अंतर्जाल की लुभावनी एवं चकाचौंध कर देने वाली आभासी दुनिया में भी इस ई-चिट्ठे (ब्लोग) के लेखक के ये प्रयास निश्चित ही सराहनीय हैं, जो निरंतर अपने कीमती समय को मातृभाषा के संवर्धन तथा भारतवासियों के मानसिक एवं चारित्रिक विकास के उत्थान में विनियोग कर रहे हैं।
दिल से मेरे इन भाई(यों) के लिये आभार एवं वंदन।
जय हिंद||
Thanks a lot for your kind words JaiprakashJi....
really hamesa soch or samj ke bolna chahiye jese kaman se nikla teer wapas ni aata wese hi muh se nikli baat wapas ni aati
thanks a lot of your right guide lines for us
bilkul sahi hai insaan ko hamesha soch kar bolna chayie ... or jo log soch smaj kar bolte hai wo he sucess paate hai
बिल्कुल सहि हे ............
It is quite rt that whatever we speak should be well thought but sometimes it happens that at that time we speak we forget this advice and go on speaking without control on our tongue and repent later. It is possible for those who have control over soul (maan)and not for every one. Any how one should be very cautious while speaking. What advice Mahatama gave to Kissan later.
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