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उत्साह, लगन, धैर्य और आत्म-विश्वास,
क्यों घुलाते गये इन गुणों को तनाव, तुलना व अविश्वास में,
डोरी आशा की तोड, मन को दूसरों से जोड,
स्वयं को दिया भुला, क्या पाओगे अपने को श्रेष्ठता की और मोड..?
स्वाभिमान को समझा निज अभिमान है,
क्योंकि दूसरों के समक्ष नाम, यश और फ़ैले कीर्ति
केवल बना लिया यही अपना काम है।
माना जीवन है नाम की कमाई,
लेकिन इस लक्ष्य में भी है विषमता समाई।
गर नाम होवे आत्म-संतोष के कर काज सारे,
भेद मिटे मन के और मानस में भरे विचार प्यारे,
नहीं तो नाम करने की मृग-मरीचिका से भला है,
गुमनाम हो नज़रों में अपने देवता बन मर जाना।
जो खुद से खुद का ही नाता तोड लिया है,
ध्यान अपने से हटा, अपनी शक्तियों को क्षीण कर लिया है,
सीमित नहीं है मस्तिष्क में भरा अदम्य ज्ञान तुम्हारा,
रहकर स्वयं में अवस्थित पा सकते हो ज्ञान रूपी सरिता का प्रखर अनंत किनारा।
अमरता नहीं है दूसरों की स्मृतियों में बस जाना,
यह तो है अपने कर्त्तव्यों को भली-भाँति निभाना,
उद्यमिता, शौर्य और सहनशीलता की जीवन में हो पराकाष्ठा,
तो कौन भला रोक पायेगा तुम्हारे गुणगान का प्रदीप्त रास्ता।
कानन में खिला पुष्प क्या है चाहता कभी निजवार्ता करना,
मिटा दुनिया की हस्ती को उसने सीखा है अपने को सद्‌गुणमय बनाना।
'आज' में बलिहारी कर समस्त इंद्रियों को,
पा जाओगे निर्भय शाश्वत बोधिसत्त्व को।
'अनुभव' है जिंदगी की अनमोल संपदा,
व्यर्थ ना गँवा, दूर करलो इससे सारी विपदा।
मन की बुराइयों को जीत खुद से खुदा को पाओ,
परावलंबी ना बनो इसलिये स्वयं को ना बिसराओ।।
        ~ जयप्रकाश

कवि परिचय 


Name - Jaiprakash,

DOB - 04/04/1992,

Place of Birth - Mukundgarh (Rajasthan),

Profession - Student (M.Com.), University of Rajasthan.

Hobby - Poetry, Painting.


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  1. Manav main chupi hui aseem pratibha ko janane aur swawlanban ki seekh pradan karne wali utkrist kavita

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