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एक सम्राट का एक नौकर था, नाई था उसका। वह उसकी मालिश करता, हजामत बनाता। सम्राट बड़ा हैरान होता था कि वह हमेशा प्रसन्न, बड़ा आनंदित, बड़ा मस्त! उसको एक रुपया रोज मिलता था। बस, एक रुपया रोज में वह खूब खाता-पीता, मित्रों को भी खिलाता-पिलाता। सस्ते जमाने की बात होगी। रात जब सोता तो उसके पास एक पैसा न होता; वह निश्चिन्त सोता। सुबह एक रुपया फिर उसे मिल जाता मालिश करके। वह बड़ा खुश था! इतना खुश था कि सम्राट को उससे ईर्ष्या होने लगी। सम्राट भी इतना खुश नहीं था। खुशी कहां! उदासी और चिंताओं के बोझ और पहाड़ उसके सिर पर थे। उसने पूछा नाई से कि तेरी प्रसन्नता का राज क्या है? उसने कहा, मैं तो कुछ जानता नहीं, मैं कोई बड़ा बुद्धिमान नहीं। लेकिन, जैसे आप मुझे प्रसन्न देख कर चकित होते हो, मैं आपको देख कर चकित होता हूं कि आपके दुखी होने का कारण क्या है? मेरे पास तो कुछ भी नहीं है और मैं सुखी हूँ; आपके पास सब है, और आप सुखी नहीं! आप मुझे ज्यादा हैरानी में डाल देते हैं। मैं तो प्रसन्न हूँ, क्योंकि प्रसन्न होना स्वाभाविक है, और होने को है ही क्या? वजीर से पूछा सम्राट ने एक दिन कि इसका राज खोजना पड़ेगा। यह नाई इतना प्रसन्न है कि मेरे मन में ईर्ष्या की आग जलती है कि इससे तो बेहतर नाई ही होते। यह सम्राट हो कर क्यों फंस गए? न रात नींद आती, न दिन चैन है; और रोज चिंताएं बढ़ती ही चली जाती हैं। घटता तो दूर, एक समस्या हल करो, दस खड़ी हो जाती हैं। तो नाई ही हो जाते। वजीर ने कहा, आप घबड़ाएं मत। मैं उस नाई को दुरुस्त किए देता हूँ। वजीर तो गणित में कुशल था। सम्राट ने कहा, क्या करोगे? उसने कहा, कुछ नहीं। आप एक-दो-चार दिन में देखेंगे। वह एक निन्यानबे रुपये एक थैली में रख कर रात नाई के घर में फेंक आया। जब सुबह नाई उठा, तो उसने निन्यानबे गिने, बस वह चिंतित हो गया। उसने कहा, बस एक रुपया आज मिल जाए, तो आज उपवास ही रखेंगे, सौ पूरे कर लेंगे! बस, उपद्रव शुरू हो गया। कभी उसने इकट्ठा करने का सोचा न था, इकट्ठा करने की सुविधा भी न थी। एक रुपया मिलता था, वह पर्याप्त था जरूरतों के लिए। कल की उसने कभी चिंता ही न की थी। ‘कल’ उसके मन में कभी छाया ही न डालता था; वह आज में ही जीया था। आज पहली दफा ‘कल’ उठा। निन्यानबे पास में थे, सौ करने में देर ही क्या थी! सिर्फ एक दिन तकलीफ उठानी थी कि सौ हो जाएंगे। उसने दूसरे दिन उपवास कर दिया। लेकिन, जब दूसरे दिन वह आया सम्राट के पैर दबाने, तो वह मस्ती न थी, उदास था, चिंता में पड़ा था, कोई गणित चल रहा था। सम्राट ने पूछा, आज बड़े चिंतित मालूम होते हो? मामला क्या है? उसने कहा: नहीं हजूर, कुछ भी नहीं, कुछ नहीं सब ठीक है। मगर आज बात में वह सुगंध न थी जो सदा होती थी। ‘सब ठीक है’--ऐसे कह रहा था जैसे सभी कहते हैं, सब ठीक है। जब पहले कहता था तो सब ठीक था ही। आज औपचारिक कह रहा था। सम्राट ने कहा, नहीं मैं न मानूंगा। तुम उदास दिखते हो, तुम्हारी आंख में रौनक नहीं। तुम रात सोए ठीक से? उसने कहा, अब आप पूछते हैं तो आपसे झूठ कैसे बोलूं! रात नहीं सो पाया। लेकिन सब ठीक हो जाएगा, एक दिन की बात है। आप घबड़ाएं मत। लेकिन वह चिंता उसकी रोज बढ़ती गई। सौ पूरे हो गए, तो वह सोचने लगा कि अब सौ तो हो ही गए; अब धीरे-धीरे इकट्ठा कर लें, तो कभी दो सौ हो जाएंगे। अब एक-एक कदम उठने लगा। वह पंद्रह दिन में बिलकुल ही ढीला-ढाला हो गया, उसकी सब खुशी चली गई। सम्राट ने कहा, अब तू बता ही दे सच-सच, मामला क्या है? मेरे वजीर ने कुछ किया? तब वह चैंका। नाई बोला, क्या मतलब? आपका वजीर...? अच्छा, तो अब मैं समझा। अचानक मेरे घर में एक थैली पड़ी मिली मुझे--निन्यानबे रुपए। बस, उसी दिन से मैं मुश्किल में पड़ गया हूं। निन्यानबे का फेर! |
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संत कबीर के दोहे
मेरे संगी दोई जरग , एक वैष्णो एक राम | वो है दाता मुक्ति का , वो सुमिरावै नाम ||
Wednesday 22 May 2013
निन्यानबे का फेर! | ओशो कथा-सागर
Monday 20 May 2013
स्वयं को ना बिसराओ ~ जयप्रकाश | Guest Posts
उत्साह, लगन, धैर्य और आत्म-विश्वास,
क्यों घुलाते गये इन गुणों को तनाव, तुलना व अविश्वास में,
डोरी आशा की तोड, मन को दूसरों से जोड,
स्वयं को दिया भुला, क्या पाओगे अपने को श्रेष्ठता की और मोड..?
स्वाभिमान को समझा निज अभिमान है,
क्योंकि दूसरों के समक्ष नाम, यश और फ़ैले कीर्ति
केवल बना लिया यही अपना काम है।
माना जीवन है नाम की कमाई,
लेकिन इस लक्ष्य में भी है विषमता समाई।
गर नाम होवे आत्म-संतोष के कर काज सारे,
भेद मिटे मन के और मानस में भरे विचार प्यारे,
नहीं तो नाम करने की मृग-मरीचिका से भला है,
गुमनाम हो नज़रों में अपने देवता बन मर जाना।
जो खुद से खुद का ही नाता तोड लिया है,
ध्यान अपने से हटा, अपनी शक्तियों को क्षीण कर लिया है,
सीमित नहीं है मस्तिष्क में भरा अदम्य ज्ञान तुम्हारा,
रहकर स्वयं में अवस्थित पा सकते हो ज्ञान रूपी सरिता का प्रखर अनंत किनारा।
अमरता नहीं है दूसरों की स्मृतियों में बस जाना,
यह तो है अपने कर्त्तव्यों को भली-भाँति निभाना,
उद्यमिता, शौर्य और सहनशीलता की जीवन में हो पराकाष्ठा,
तो कौन भला रोक पायेगा तुम्हारे गुणगान का प्रदीप्त रास्ता।
कानन में खिला पुष्प क्या है चाहता कभी निजवार्ता करना,
मिटा दुनिया की हस्ती को उसने सीखा है अपने को सद्गुणमय बनाना।
'आज' में बलिहारी कर समस्त इंद्रियों को,
पा जाओगे निर्भय शाश्वत बोधिसत्त्व को।
'अनुभव' है जिंदगी की अनमोल संपदा,
व्यर्थ ना गँवा, दूर करलो इससे सारी विपदा।
मन की बुराइयों को जीत खुद से खुदा को पाओ,
परावलंबी ना बनो इसलिये स्वयं को ना बिसराओ।।
~ जयप्रकाश
कवि परिचय
Name - Jaiprakash,
DOB - 04/04/1992,
Place of Birth - Mukundgarh (Rajasthan),
Profession - Student (M.Com.), University of Rajasthan.
Hobby - Poetry, Painting.
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Sunday 19 May 2013
Chanakya Wisdom Quotes About Importance Of Education
Though men be endowed with beauty and youth and born in noble families, yet without education they are like the palasa flower, which is void of sweet fragrance.
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Saturday 18 May 2013
Chanakya Wisdom Quotes About Company With Fools | Chanakya Daily Quotes
Do not keep company with a fool for as we can see he is a two-legged beast. Like an unseen thorn he pierces the heart with his sharp words.
-Chanakya
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Friday 17 May 2013
सैकड़ों चलते हैं लेकिन मुश्किल से एक पहुंचता है-वह भी दुर्लभ है | ओशो कथा सागर
तिब्बत में यह प्राचीन कहावत है कि सैकड़ों चलते हैं लेकिन मुश्किल से एक पहुंचता है--वह भी दुर्लभ है..
मुझे एक प्राचीन तिब्बती कथा याद आती है...
दो आश्रम थेः एक आश्रम तिब्बत की राजधानी लहासा में था और इसकी एक शाखा दूर कहीं पहाड़ों के भीतर थी। वह लामा, जो इस आश्रम का प्रधान था, बूढ़ा हो रहा था और वह चाहता था कि प्रमुख आश्रम से उसका उत्तराधिकारी बनने के लिए किसी को वहां भेजा जाए। उसने एक संदेश भेजा।
एक लामा वहां गया--यह कुछ सप्ताह का पैदल मार्ग था। उसने प्रधान से कहाः 'हमारे गुरु बहुत बीमार हैं, वृद्ध हैं और इस बात की पूरी संभावना है कि वह अब बहुत दिनों तक नहीं जीएंगे। अपनी मृत्यु से पूर्व, वह चाहते हैं कि आप किसी संन्यासी को जो भलीभांति प्रशिक्षित हो, को वहां भेज दें ताकि वह आश्रम का उत्तरदायित्व सम्हाल सके।
प्रधान ने कहाः 'कल सुबह तुम उन सबको ले जाओ।'
उस नौजवान ने कहाः 'उन सबको ले जाओ? मैं केवल एक को लेने आया हूं। उन सबको ले जाओ, से आपका क्या मतलब है?
उसने कहाः 'तुम समझते नहीं हो। मैं सौ संन्यासियों को भेजूंगा।'
'लेकिन', उस नौजवान ने कहाः 'यह तो बहुत अधिक है। हम इतने सारे लोगों का क्या करेंगे? हम गरीब हैं और हमारा आश्रम भी गरीब है। एक सौ संन्यासी हमारे ऊपर भार होंगे, और मैं तो केवल एक को भेजने की प्रार्थना करने यहां आया हूं।
प्रधान ने कहाः 'चिंता न करो, केवल एक ही पहुंचेगा। मैं भेजूंगा सौ, पर निन्यानबे राह में ही खो जाएंगे। तुम सौभाग्यशाली होगे यदि एक भी पहुंच जाए।'
उसने कहाः 'अद्भुत...'
दूसरे दिन बड़ा एक सौ संन्यासियों का, जुलूस वहां से रवाना हुआ और उनको सारे देश में से होकर गुजरना था। प्रत्येक संन्यासी का घर रास्तें में कहीं न कहीं पड़ता था और लोग खिसकना शुरू कर दिये...'मैं वापस आऊंगा। बस थोड़े से दिन अपने माता-पिता के साथ...मैं बहुत साल से वहां नहीं गया हूं।' एक सप्ताह में केवल दस लोग बचे थे।
उस नौजवान ने कहाः 'वह बूढ़ा प्रधान शायद ठीक ही था। देखें इन दस लोगों का क्या होता है।'
जैसे ही वे एक नगर में उन्होंने प्रवेश किया, कुछ संन्यासी आए और बोले कि उनके प्रधान की मृत्यु हो गई हैः 'इसलिए आपकी बड़ी कृपा होगी--आप दस हैं, अगर एक लामा आप हमें दे सकें जो प्रधान बन सके-और जो भी आप चाहें हम सब कुछ करने को तैयार हैं।' अब हर कोई प्रधान बनने का इच्छुक था। अंततः उन्होंने एक व्यक्ति को तय किया और उसे वहीं छोड़ दिया।
एक दूसरे नगर में, राजा के कुछ आदमी आए और बोलेः 'रुको, हमें तीन संन्यासी चाहिए क्योंकि राजा की बेटी की शादी है और हमें तीन पुरोहितों की आवश्यकता है। यह हमारी परंपरा है। इसलिए या तो आप अपनी इच्छा से आ जाएं वर्ना हमें आपको जबरदस्ती ले जाना पड़ेगा।'
तीन आदमी और चले गए, केवल छह बचे। और इस तरह से वे एक-एक करके कम होते चले गए। आखिर में केवल दो व्यक्ति ही बचे। और जैसे-जैसे वे आश्रम के निकट पहुंच रहे थे...सांझ हो गई थी, एक जवान स्त्री राह पर उन्हें मिली। उसने कहाः 'आप लोग इतने करूणावान हैं। मैं यहां पहाड़ों पर रहती हूं--मेरा घर यहीं पर है। मेरे पिता एक शिकारी हैं, मेरी मां की मृत्यु हो चुकी है। और मेरे पिता बाहर गए हुए हैं, उन्होंने आज लौटने का वायदा किया था, पर वे अभी तक लौटे नहीं हैं। और रात में अकेली रहने से मैं बहुत भयभीत हूं...बस एक संन्यासी, केवल एक रात के लिए।'
वे दोनों ठहरना चाहते थे! स्त्री इतनी सुंदर थी कि उनमें आपस में बड़ा संघर्ष था। वह नौजवान जो संदेशवाहक बन कर आया था उन एक सौ व्यक्तियों को गायब होते, जाते हुए देख चुका था, और अब अंत में...अंत में उन्होंने उस स्त्री से ही कहाः 'तुम हममें से एक को चुन लो, नहीं तो व्यर्थ में झगड़ा होगा, और हम बौद्ध भिक्षुओं से लड़ने की आशा तो की नहीं जाती।'
उसने कम आयु वाले संन्यासी को, जो कि सुंदर भी अधिक था, चुन लिया और उसे लेकर घर के भीतर चली गई। दूसरे संन्यासी ने उस नौजवान से कहाः 'अब चलो भी। वह आदमी अब वापस नहीं आएगा; उसे भूल ही जाओ।'
नौजवान ने कहाः 'परंतु अब, तुम मजबूत बने रहना--आश्रम बहुत समीप है।' और आश्रम से ठीक पहले, अंतिम गांव में, एक नास्तिक ने उस संन्यासी को चुनौती दीः 'कोई आत्मा नहीं है, कोई ईश्वर नहीं है। यह सब फिक्शन, कल्पना है, यह केवल लोगों का शोषण करने के लिए है। मैं तुम्हें सार्वजनिक वाद-विवाद के लिए चुनौती देता हूं।'
नौजवान ने कहाः 'इस सार्वजनिक वाद-विवाद के चक्कर में मत फंसो, क्योंकि मैं नहीं जानता कि यह कब तक चलेगा। और मेरा प्रधान प्रतीक्षा कर रहा होगा-शायद वह अब तक मर भी गया होगा।'
संन्यासी ने कहाः यह पराजय होगी, बौद्धधर्म की पराजय। जब तक कि मैं इस व्यक्ति को हरा न दूं, मैं इस जगह से हिल नहीं सकता। सार्वजनिक वाद-विवाद तो अब होगा ही, अतः सारे गांव को खबर कर दो।
नौजवान ने कहाः 'अब बहुत हो गया! क्योंकि तुम्हारे गुरु ने कहा था कि कम से कम एक तो पहुंचेगी ही, पर ऐसा लगता है कि अकेला मैं ही वापस पहुंचूंगा।'
उसने कहाः 'तुम यहां से भाग जाओ। मैं एक तार्किक हूं और मैं इस तरह की चुनौती बरदाश्त नहीं कर सकता। इसमें चाहे महीनों लग जाये। हम हर बात की विस्तार से चर्चा करने जा रहे हैं क्योंकि मैं जानता हूं, मैंने इस आदमी के बारें में सुना है। वह भी बड़ा बौद्धिक, बड़ा दार्शनिक व्यक्ति है। तुम जाओ और यदि वाद-विवाद में मैं जीत गया तो मैं आऊंगा। यदि मैं हार गया तब मुझे उसका शिष्य हो जाना पड़ेगा; फिर मेरी प्रतीक्षा न करना।'
उसने कहाः 'यह तो बहुत हो गया।
वह आश्रम पहुंचा। बूढ़ा प्रधान प्रतीक्षा कर रहा था। उसने कहाः 'तुम आ गए़? तुम्हीं मेरे उत्तराधिकारी होओगे; उन एक सौ में से तो कोई यहां आने से रहा।'
और गुरु जानता था कि केवल एक ही वहां पहुंचेगा।
तिब्बत में यह प्राचीन कहावत है कि सैकड़ों चलते हैं लेकिन मुश्किल से एक पहुंचता है--वह भी दुर्लभ है।
मुझे एक प्राचीन तिब्बती कथा याद आती है...दो आश्रम थेः एक आश्रम तिब्बत की राजधानी लहासा में था और इसकी एक शाखा दूर कहीं पहाड़ों के भीतर थी। वह लामा, जो इस आश्रम का प्रधान था, बूढ़ा हो रहा था और वह चाहता था कि प्रमुख आश्रम से उसका उत्तराधिकारी बनने के लिए किसी को वहां भेजा जाए। उसने एक संदेश भेजा।
एक लामा वहां गया--यह कुछ सप्ताह का पैदल मार्ग था। उसने प्रधान से कहाः 'हमारे गुरु बहुत बीमार हैं, वृद्ध हैं और इस बात की पूरी संभावना है कि वह अब बहुत दिनों तक नहीं जीएंगे। अपनी मृत्यु से पूर्व, वह चाहते हैं कि आप किसी संन्यासी को जो भलीभांति प्रशिक्षित हो, को वहां भेज दें ताकि वह आश्रम का उत्तरदायित्व सम्हाल सके।
प्रधान ने कहाः 'कल सुबह तुम उन सबको ले जाओ।'
उस नौजवान ने कहाः 'उन सबको ले जाओ? मैं केवल एक को लेने आया हूं। उन सबको ले जाओ, से आपका क्या मतलब है?
उसने कहाः 'तुम समझते नहीं हो। मैं सौ संन्यासियों को भेजूंगा।'
'लेकिन', उस नौजवान ने कहाः 'यह तो बहुत अधिक है। हम इतने सारे लोगों का क्या करेंगे? हम गरीब हैं और हमारा आश्रम भी गरीब है। एक सौ संन्यासी हमारे ऊपर भार होंगे, और मैं तो केवल एक को भेजने की प्रार्थना करने यहां आया हूं।
प्रधान ने कहाः 'चिंता न करो, केवल एक ही पहुंचेगा। मैं भेजूंगा सौ, पर निन्यानबे राह में ही खो जाएंगे। तुम सौभाग्यशाली होगे यदि एक भी पहुंच जाए।'
उसने कहाः 'अद्भुत...'
दूसरे दिन बड़ा एक सौ संन्यासियों का, जुलूस वहां से रवाना हुआ और उनको सारे देश में से होकर गुजरना था। प्रत्येक संन्यासी का घर रास्तें में कहीं न कहीं पड़ता था और लोग खिसकना शुरू कर दिये...'मैं वापस आऊंगा। बस थोड़े से दिन अपने माता-पिता के साथ...मैं बहुत साल से वहां नहीं गया हूं।' एक सप्ताह में केवल दस लोग बचे थे।
उस नौजवान ने कहाः 'वह बूढ़ा प्रधान शायद ठीक ही था। देखें इन दस लोगों का क्या होता है।'
जैसे ही वे एक नगर में उन्होंने प्रवेश किया, कुछ संन्यासी आए और बोले कि उनके प्रधान की मृत्यु हो गई हैः 'इसलिए आपकी बड़ी कृपा होगी--आप दस हैं, अगर एक लामा आप हमें दे सकें जो प्रधान बन सके-और जो भी आप चाहें हम सब कुछ करने को तैयार हैं।' अब हर कोई प्रधान बनने का इच्छुक था। अंततः उन्होंने एक व्यक्ति को तय किया और उसे वहीं छोड़ दिया।
एक दूसरे नगर में, राजा के कुछ आदमी आए और बोलेः 'रुको, हमें तीन संन्यासी चाहिए क्योंकि राजा की बेटी की शादी है और हमें तीन पुरोहितों की आवश्यकता है। यह हमारी परंपरा है। इसलिए या तो आप अपनी इच्छा से आ जाएं वर्ना हमें आपको जबरदस्ती ले जाना पड़ेगा।'
तीन आदमी और चले गए, केवल छह बचे। और इस तरह से वे एक-एक करके कम होते चले गए। आखिर में केवल दो व्यक्ति ही बचे। और जैसे-जैसे वे आश्रम के निकट पहुंच रहे थे...सांझ हो गई थी, एक जवान स्त्री राह पर उन्हें मिली। उसने कहाः 'आप लोग इतने करूणावान हैं। मैं यहां पहाड़ों पर रहती हूं--मेरा घर यहीं पर है। मेरे पिता एक शिकारी हैं, मेरी मां की मृत्यु हो चुकी है। और मेरे पिता बाहर गए हुए हैं, उन्होंने आज लौटने का वायदा किया था, पर वे अभी तक लौटे नहीं हैं। और रात में अकेली रहने से मैं बहुत भयभीत हूं...बस एक संन्यासी, केवल एक रात के लिए।'
वे दोनों ठहरना चाहते थे! स्त्री इतनी सुंदर थी कि उनमें आपस में बड़ा संघर्ष था। वह नौजवान जो संदेशवाहक बन कर आया था उन एक सौ व्यक्तियों को गायब होते, जाते हुए देख चुका था, और अब अंत में...अंत में उन्होंने उस स्त्री से ही कहाः 'तुम हममें से एक को चुन लो, नहीं तो व्यर्थ में झगड़ा होगा, और हम बौद्ध भिक्षुओं से लड़ने की आशा तो की नहीं जाती।'
उसने कम आयु वाले संन्यासी को, जो कि सुंदर भी अधिक था, चुन लिया और उसे लेकर घर के भीतर चली गई। दूसरे संन्यासी ने उस नौजवान से कहाः 'अब चलो भी। वह आदमी अब वापस नहीं आएगा; उसे भूल ही जाओ।'
नौजवान ने कहाः 'परंतु अब, तुम मजबूत बने रहना--आश्रम बहुत समीप है।' और आश्रम से ठीक पहले, अंतिम गांव में, एक नास्तिक ने उस संन्यासी को चुनौती दीः 'कोई आत्मा नहीं है, कोई ईश्वर नहीं है। यह सब फिक्शन, कल्पना है, यह केवल लोगों का शोषण करने के लिए है। मैं तुम्हें सार्वजनिक वाद-विवाद के लिए चुनौती देता हूं।'
नौजवान ने कहाः 'इस सार्वजनिक वाद-विवाद के चक्कर में मत फंसो, क्योंकि मैं नहीं जानता कि यह कब तक चलेगा। और मेरा प्रधान प्रतीक्षा कर रहा होगा-शायद वह अब तक मर भी गया होगा।'
संन्यासी ने कहाः यह पराजय होगी, बौद्धधर्म की पराजय। जब तक कि मैं इस व्यक्ति को हरा न दूं, मैं इस जगह से हिल नहीं सकता। सार्वजनिक वाद-विवाद तो अब होगा ही, अतः सारे गांव को खबर कर दो।
नौजवान ने कहाः 'अब बहुत हो गया! क्योंकि तुम्हारे गुरु ने कहा था कि कम से कम एक तो पहुंचेगी ही, पर ऐसा लगता है कि अकेला मैं ही वापस पहुंचूंगा।'
उसने कहाः 'तुम यहां से भाग जाओ। मैं एक तार्किक हूं और मैं इस तरह की चुनौती बरदाश्त नहीं कर सकता। इसमें चाहे महीनों लग जाये। हम हर बात की विस्तार से चर्चा करने जा रहे हैं क्योंकि मैं जानता हूं, मैंने इस आदमी के बारें में सुना है। वह भी बड़ा बौद्धिक, बड़ा दार्शनिक व्यक्ति है। तुम जाओ और यदि वाद-विवाद में मैं जीत गया तो मैं आऊंगा। यदि मैं हार गया तब मुझे उसका शिष्य हो जाना पड़ेगा; फिर मेरी प्रतीक्षा न करना।'
उसने कहाः 'यह तो बहुत हो गया।
वह आश्रम पहुंचा। बूढ़ा प्रधान प्रतीक्षा कर रहा था। उसने कहाः 'तुम आ गए़? तुम्हीं मेरे उत्तराधिकारी होओगे; उन एक सौ में से तो कोई यहां आने से रहा।'
और गुरु जानता था कि केवल एक ही वहां पहुंचेगा।
तिब्बत में यह प्राचीन कहावत है कि सैकड़ों चलते हैं लेकिन मुश्किल से एक पहुंचता है--वह भी दुर्लभ है।
Thursday 16 May 2013
Chanakya Wisdom Quotes | Daily Chanakya Quotes
There is no poverty for the industrious. Sin does not attach itself to the person practicing japa (chanting of the holy names of the Lord). Those who are absorbed in maunam (silent contemplation of the Lord) have no quarrel with others. They are fearless who remain always alert.
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