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भाषा वैसे तो संवाद का माध्यम मात्र है लेकिन हम चीज़ो को  मल्टीपरपज बनाने में यकीन रखते है इसलिए हमारे देश में भाषा, संवाद के साथ साथ वाद -विवाद और स्टेटस सिंबल का भी माध्यम बन चुकी है। हमें बचपन में बताया गया की हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाए आपस में बहने है लेकिन सयाने होने पर, इनका  झगड़ा  देखकर  हमें पता चला की  इनका रिश्ता आपस में बहन का नहीं है बल्कि देवरानी -जेठानी सा है। दाल इतनी मँहगी होने के बावजूद हम अभी भी घर की मुर्र्गी को दाल बराबर ही मानते है इसलिए  भले ही  इंग्लिश  अच्छे  से ना आती हो  लेकिन हिंदी बोलने और लिखने में हमें शर्म ज़रूर आती  है। निर्बल का बल भले ही राम को माना जाता है लेकिनस्टेटस सिंबलका बल इंग्लिश को ही मनवाया गया है। इंग्लिश को जिस तरह से स्टेटस सिंबल से जोड़ा गया है उसे देखकर लगता है कि इसके लिए ज़रूर एम सील और फेवीक्विक  के सयुंक्त  उद्यम द्वारा  उत्पादित  माल का इस्तेमाल किया गया होगा इंग्लिश और स्टेटस सिंबल का जो येमेल-जोलहै उसमे बहुतझोलहै लेकिन फिर भी ये आपस में इतने मिले हुए है कि इन्हे अलग करना उतना ही मुश्किल है जितना की राहुल गाँधी में नेतृत्व क्षमता ढूँढना

अम्मा! दादू बूढ़ा है
-एस. कमलवंशी

अम्मा! दादू बूढ़ा है,
कचरा, करकट कूड़ा है,
क्यों न इसे फेंक दें, तपती धूप में सेंक दें!

तुम ही तो कहती हो ये खाँसता है,
चलते चलते हाँफता है,
कितना भी खिलाओ अच्छा इसको,
फिर भी हमेशा माँगता है
न कहीं जाता है, न कुछ करता है,
खटिया पर पड़े पड़े सड़ता है,
अंधा है, बहरा है, चाल तो देखो लंगड़ा है,
ज़ोर नहीं रत्ती भर फिर भी कितना लड़ता है।

इसे देख बापू झल्लाते हैं,
सामने ही दाँत किटकिटाते हैं,
कहते हैं मर क्यों नहीं जाता,
कब से जिंदा है, जग से तर क्यों नहीं जाता।
अब क्या बचा है जिसके लिए ज़िंदा है,
इसकी वजह से जीवन शर्मिंदा है,
कहते हैं, जायदाद में कुछ नहीं इसके पास,
जो है, उसपे इसका शिकंजा है।

अम्मा! दादू बूढ़ा है,
कचरा करकट कूड़ा है,
क्यों न इसे जला दें, या फिर जहर पिला दें!

अम्मा! एक बात कहूँ, मारोगी तो नहीं!
दादू जैसा बंद कमरे में डालोगी तो नहीं!

अम्मा! दादू अच्छा है,
मेरी तरह बच्चा है,
अम्मा! दादू रोता है,
हम सबके बावजूद अकेला होता है,
जानती हो, वह सुनता भी है,
मन ही मन कुछ बुनता भी है।
बापू के तानों पर सहम जाता है,
रूखा सूखा जो दिया सब खाता है,
वह चल नहीं पाता फिर भी गाँव जाता है,
सोना हो या सूखे बेर, हमारे लिए ही लाता है।

दादू अब भी बापू को चाहता है,
तुम्हें बेटी उन्हें बेटा मानता है,
भले तुम उसे बुरा कहो, गाली दो,
बापू परिवार जानता है, दुआ जानता है।

अम्मा! कुछ दिन बाद दादू मर जाएगा,
तो मुझे कहानी कौन सुनाएगा?
चोट लगेगी तो कौन चुप कराएगा?
तम्बाखू के चार पैसे मेरे लिए धोती में कौन छुपाएगा,
मेरी शरारत पर कौन हँसेगा?
तू मेरे जैसा है, मुझे कौन बताएगा?
मुझे खिलौना नहीं चाहिए, मिठाई नहीं चाहिए,
मुझे दादू चाहिए, मैं दादू कहाँ से लाऊँगा?

अम्मा! दादू बूढ़ा है,
कचरा करकट कूड़ा है,
बेकार सही लाचार सही,
हम बिन वह अधूरा है,
क्यों न उसे प्यार दें! अपने पाप उतार दें!

*****


नाम: सचिन कमलवंशी

उपनाम: एस. कमलवंशी
जन्म तिथि: १० अक्टूबर १९९२
जन्म स्थान: कानपुर, उत्तर प्रदेश
प्रमुख कृतियां: अम्मा! दादू बूढ़ा है, आज बहुत रोई पिया जी, ऐ बसंती हवा, दर्पण, दास्तान-ए-कलम, बचपन-बुढ़ापा, भिखारी, मित्र का चित्र, मेरा गाँव, रत-मिलन, सखी री मोरे पिया कौन विरमाये
शैली: प्रेम, विरह, सामाजिक चेतना, प्राकृतिक सौंदर्य इत्यादि
भाषा: ब्रज मिश्रित हिंदी, उर्दू-हिंदी

मेरा गाँव
(एस. कमलवंशी)

मेरे जहन में आज भी मेरा प्यारा गाँव रहता है,
लोग यहाँ के रंग रंगीले, प्यार रगों में बहता है,
मेरे जहन में आज भी मेरा...

सहर जहाँ की मध्धम मध्धम, धूप जहाँ की रेशम,
छाँव जहाँ की कोमल ममता, टुकड़ा भारत देशम्।
महक जहाँ की मादक-संदल, पावन पवन समीरी,
मावठ सावन रिमझिम करते, कजरे बादल केशम्।।

साँझ सुहाती, भोर है भाती, मीठी-रात दुपहरी,
बूढ़ी-बातें, बच्चा-टोली, बनती आम की छहरी।
खाट विराजे संग सयाने, पंचायत तब जारी,
बाल-लंगोटी कैरी चाखत, जामुनिया अति कारी।।

पीली सरसों प्यारी प्यारी, दलहन की हरियारी,
चुन-चुन डलिया लाती गुजरिया, शाक-फूल-तरकारी।
नत-नत धरा बिछाएँ फलियाँ, शोभित पुष्प खिलाएँ कलियाँ,
ओस मधु बिखरी चहुओरी, चन्द्र-मयंक उजियारी।।

हरा भरा, हर द्वार खड़ा, हर माह में सावन कहता है,
मेरे जहन में आज भी मेरा प्यारा गाँव रहता है।

नव युवा, पुलिया के यारी, लोकगीत गुंजन करें नारी,
चौपाले, चरवाह चर्चामय, गउएं खायें फसलें सारी।
नहर नदी में डुबका-डुबकी, बाग़ बगीचा लुपका-छुपकी,
सांझ ढले जब घर को लौटे, अम्मा देवें गारी।।

भोजन पा चढ़ जाएँ अटरिया, राम-नाम अरु कहत संवरिया,
कुछ पसरे अँगना में माझी, ओढ़े सिर से पैर चदरिया।
दादी नानी किस्सा कहतीं, बूझ-पहेली नदियाँ बहतीं,
किस्साओं में राजा होते, तारों में भी परियां रहतीं।।

चाँद को रोटी, तारे मोती, बच्चा बच्चा कहता है,
मेरे जहन में आज भी मेरा प्यारा गाँव रहता है।

फागुन होली रंग-रंगोली, हाट डगर रम जाए टोली,
सखियाँ पूंछत पुन पुन सारी, कहा कहा लाई हमजोली।
दहन होलिका कर नर नारी, फाग तान छिड़कर तब बोली,
भोर भए सब भंग-रंग-संग, हिल-मिल लोग मनाएँ होली।।

सावन की रुत रिमझिम छाती, याद बहन को भ्रात की आती,
कुछ तो तकती राह मिलन की, कुछ लिखती सजना को पाती।
बाग हिंडोले पड़ गए फूलन, संग सहेली जाएं झूलन,
कुछ गातीं ऋतु गीत मिलन के, कुछ गावें बरसाती।।
रक्षाबंधन कर में भाता, प्रेम प्रतीक भगिनी संग नाता,
जब बारिश की टिप टिप होती, दुख दरद सबहिं मिटा जाता।।

मास अमावस आई दीवाली, रात अंधेरी काली,
बर्तन, झालर, दीप, रंगोली, हाट घाट पर लाली।
कुछ पर मिलते खील-बतासे, कुछ पर आतिशबाज़ी,
पोशाकें अति ही शोभामय, चमकन रेशम वाली।।
पूज गजानन, रमा-लक्ष्मी, जलती दीप की डाली,
खेल, पटाखे, लड़ी, फुलझड़ी, कहते आई दीवाली।।

हर त्यौहार करता पुकार, यहाँ प्यार का झरना बहता है,
मेरे जहन में आज भी मेरा प्यारा गाँव रहता है।

गाढ़े बंधन बंध बढ़ाय, दु:ख-सुख-विपदा संग सहाय,
  मन संचय बना प्रेम समंदर, धन संचय दरिया में जाय।।
बैर, द्वेष, बेईमानी, कपट, छल, न इस गाँव की रीति,
ढाई आंखर जाने मनुआ, प्यार, प्रेम और प्रीति।।

हो गर जनम तो इस धरती पर, जीता, मरता कहता है,
मेरे जहन में आज भी मेरा प्यारा गाँव रहता है।

*****

नाम: सचिन कमलवंशी
उपनाम: एस. कमलवंशी
जन्म तिथि: १० अक्टूबर १९९२
जन्म स्थान: कानपुर, उत्तर प्रदेश
प्रमुख कृतियां: अम्मा! दादू बूढ़ा है, आज बहुत रोई पिया जी, ऐ बसंती हवा, दर्पण, दास्तान-ए-कलम, बचपन-बुढ़ापा, भिखारी, मित्र का चित्र, मेरा गाँव, रत-मिलन, सखी री मोरे पिया कौन विरमाये
शैली: प्रेम, विरह, सामाजिक चेतना, प्राकृतिक सौंदर्य इत्यादि
भाषा: ब्रज मिश्रित हिंदी, उर्दू-हिंदी

दुनिया में एक से एक कलाकार मौजूद है जिनकी प्रतिभा देखकर लोग चमत्कार समझने लगते है। ऐसे ही एक कलाकार ने पांच तरह की पुस्तकों को लिखकर चौका दिया है। लेखक पीयूष गोयल ने उल्टे अक्षरों में गीता, सुई से मधुशाला, मेंहंदी से गीतांजलि, कार्बन पेपर से पंचतंत्र के साथ ही कील से पीयूष वाणी लिख डाली। पीयूष की इन किताबों को देखकर हर कोई हतप्रभ है।कला और दक्षता की कोई सीमा नहीं होती,रोज नई उपलब्‍धियां प्रकाश में आती रहती हैं, ऐसा ही दिलचस्‍प कारनामा किया है श्रीमती रविकांता एवं डॉ. दवेंद्र कुमार गोयल के बेटे पीयूष गोयल ने। उसने पंच प्रचलित पुस्‍तकें पंच तरीके से लिख डाली हैं।

इनमें अध्‍यात्‍म दर्शन और कर्मफल संस्‍कृति को व्‍यापक और सहजता के साथ जनग्राही बनाने वाली भागवत गीता भी शामिल है।49 वर्षीय पीयूष गोयल अपने धुन में रमकर कुछ अलग करने में जुटे कि शब्दों को उल्टा लिखने में लग गए। इस धुन में ऐसे रमे कि कई अलग-अलग सामग्री से कई पुस्तकें लिख दीं।

ना दरगाह में,ना मंदिर में,
 इंसानियत बिकती नहीं है दुकानों पर,
ऐ शख्स अगर अपनी राह में
 किसी कमजोर को देखना तो,
 हाथ ज़रूर बढ़ाना उसकी तरफ़,
शायद मुस्करा दे वो पल भर के लिए तुझे देखकर।


पल भर शिकस्त है तेरे इन आंसुओं की,
 खुश हूँ देखके कि तू फिर भी मुस्कराता है ,
ज़मीन पर रखने के लिए कोई चादर नहीं है तेरे पास,
 आसमान की गोद में रखके भी सुकून से रहता है।


मोहब्बत कभी तूने की नहीं पर,
 आते जाते सभी पे मरता है तू हर पल यहीं ,
रास्तों में ढूँढता है हर राह तू पर फिर भी हर राह भटकता है हर घडी,
ना कर इतना गुरुर तू खुद पर यहीं आया था यहीं मिल जायेगा, 
कुछ लम्हें साथ लाया था बस इन्ही को ले जायेगा।  

आंसुओं की कीमत को पहचान ले यहाँ,
 मोल तो इनका नहीं है कुछ यहाँ ,
खुश रह के थोडा जीना तो सीख ले,
 ना जाने कब इस मिटटी में मिल जायेगा।   

 ~ दिनेश करमचंदानी 

नाम: दिनेश करमचंदानी 
पेशा : बहुराष्ट्रीय संस्था में सॉफ्टवेर इंजिनियर 
स्थान: सिडनी, ऑस्ट्रेलिया 

दुनिया में अनेक धर्मों और उनके मानने वालों की ईश्‍वर के बारे में अपनी-अपनी धारणाएं हैं। सबके अपने-अपने भगवान हैं और अपने भगवान को श्रेष्‍ठ साबित करने की एक होड़ सबमें मची हुई है। पर उस होड़ के परे जाकर क्‍या हमने कभी सोचा है कि भगवान क्‍या है? ‘वार एंड वीस’ और ‘अन्‍ना करेनिना’ जैसी महान कृतियों के लेखक लियो टॉल्‍सटॉय इस बारे में कुछ कह रहे हैं अपनी इस कहानी में। कहानी का घटनास्‍थल है भारत के सूरत शहर का एक कॉफी हाउस-


लेखक- लियो टॉल्‍सटॉय

सूरत का कॉफी हाउस ~ लियो टोल्स्टोय की कहानियाँ ~ Leo Tolstoy Stories in Hindi

सूरत नगर में एक कहवाघर था, जहां अनेकानेक यात्री और विदेशी दुनियाभर से आते थे और विचारों का आदान-प्रदान करते थे। एक दिन वहां फारस का एक विद्वान आया। पूरी जिंदगी ‘प्रथम कारण’ के बारे में चर्चा करते करते उसका दिमाग ही चल गया था। उसने यह सोचना शुरू कर दिया था कि सृष्टि को नियंत्रण में रखने वाली कोई उच्‍च सत्‍ता नहीं है। इस व्‍यक्ति के साथ एक अफ्रीकी गुलाम भी था, जिससे उसने पूछा- बताओ, क्‍या तुम्‍हारे ख्‍याल में भगवान है? गुलाम ने अपनी कमरबंद में से किसी देवता की लकड़ी की मूर्ति निकाली और बोला- यही है मेरा भगवान, जिसने जिंदगी भर मेरी रक्षा की है। गुलाम का जवाब सुनकर सभी चकरा गए। उनमें से एक ब्राह्मण था। वह गुलाम की ओर घूमा और बोला- ब्रह्म ही सच्‍चा भगवान है। एक यहूदी भी वहां बैठा था। उसका दावा था- इस्राइल वासियों का भगवान ही सच्‍चा भगवान है, वे ही उसकी चुनी हुई प्रजा हैं। एक कैथोलिक ने दावा किया- भगवान तक रोम के कैथोलिक चर्च द्वारा ही पहुंचा जा सकता है। लेकिन तभी एक प्रोटेस्‍टेंट पादरी जो वहां मौजूद था, बोल उठा- केवल गॉस्‍पेल के अनुसार प्रभु की सेवा करने वाले प्रोटेस्‍टेंट ही बचेंगे। कहवाघर में बैठे एक तुर्क ने कहा- सच्‍चा धर्म मुहम्‍मद और उमर के अनुयायियों का ही है, अली के अनुयायियों का नहीं। हर कोई दलीलें रख रहा था और चिल्‍ला रहा था। केवल एक चीनी ही, जो कि कनफ्यूशियस का शिष्‍य था, कहवाघर के एक कोने में चुपचाप बैठा था और विवाद में हिस्‍सा नहीं ले रहा था। तब सभी लोग उस चीनी की ओर घूमे और उन्‍होंने उससे अपने विचार प्रकट करने को कहा।

मूर्ख मित्र ~ मित्रभेद ~ पंचतंत्र | The King and the Foolish Monkey Panchatantra Story In Hindi

किसी राजा के राजमहल में एक बन्दर सेवक के रुप में रहता था । वह राजा का बहुत विश्वास-पात्र और भक्त था । अन्तःपुर में भी वह बेरोक-टोक जा सकता था ।

जैसे को तैसा  ~ The Rat that ate Iron Panchatantra Story In Hindi

एक स्थान पर जीर्णधन नाम का बनिये का लड़का रहता था । धन की खोज में उसने परदेश जाने का विचार किया । उसके घर में विशेष सम्पत्ति तो थी नहीं, केवल एक मन भर भारी लोहे की तराजू थी । उसे एक महाजन के पास धरोहर रखकर वह विदेश चला गया । विदेश स वापिस आने के बाद उसने महाजन से अपनी धरोहर वापिस मांगी । महाजन ने कहा----"वह लोहे की तराजू तो चूहों ने खा ली ।"

करने से पहले सोचो

 क्रेन और नेवला ~ Foolish Crane And The Mongoose Panchatantra Story In Hindi
जंगल के एक बड़े वट-वृक्ष की खोल में बहुत से बगुले रहते थे । उसी वृक्ष की जड़ में एक साँप भी रहता था । वह बगलों के छोटे-छोटे बच्चों को खा जाता था ।

एक बगुला साँप द्वार बार-बार बच्चों के खाये जाने पर बहुत दुःखी और विरक्त सा होकर नदी के किनारे आ बैठा । 

Nisheeth Ranjan

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