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Sep 13, 2014

धन दौलत से ज्ञानियों को वश में करना असंभव है !- Bhartrihari Neeti Shatak Shloka-17

A Learned man  cannot become a slave to the wealthy People!-Bhartrihari

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अधिगतपरमार्थान्पण्डितान्मावमंस्था 
स्तृणमिव लघुलक्ष्मीर्नैव तान्संरुणद्धि ।
अभिनवमदलेखाश्यामगण्डस्थलानां
 न भवति बिसतन्तुवरिणं वारणानाम् ॥[17]

Hindi Translation Of Neeti Shatak Shlok About Scholars

किसी भी ज्ञानी व्यक्ति को कभी काम नहीं आंकना चाहिए और न ही उनका अपमान करना चाहिए क्यूंकि भौतिक सांसारिक धन सम्पदा उनके लिए तुक्ष्य घास से समान है। जिस तरह एक मदमस्त हाथी को कमल की पंखुड़ियों से नियंत्रित नहीं किया जा सकता ठीक उसी प्रकार धन दौलत से ज्ञानियों को वश  में करना असंभव है !

English Translation of Neeti Shatak Shloka About Knowledge

Do not insult those men of wisdom who have attained the Supreme Knowledge! The material wealth is as worthless as a piece of grass for them! Do not ever restrain them. A lotus stalk cannot hold back the elephants whose temple-regions are darkened by the streaks of fresh rut.

Sep 10, 2014

जो दूसरों के बारे में सोचते हैं उन्हें संतोष भी मिलता है यश भी और सम्मान भी।-Hindi Mythological Stories

देव दानवों में विवाद छिड़ा कि दानों समुदायों में श्रेष्ठ कौन है? फैसला कराने के लिए प्रजापति ब्रह्मा जी के पास पहुंचे। उन्होंने दोनों वर्गों को सान्त्वना दी और सम्मान पूर्वक ठहरा दिया।

दूसरे दिन दानों बुलाये गये। अलग-अलग स्थानों पर दोनों को भोजन के लिए बुलाया गया। थालियाँ व्यंजनों से सजी थी।

ब्रह्मा जी ने एक कौतूहल किया। मंत्र शक्ति से दानों वर्गों को कोहनियों पर से हाथ मुड़ने में अवरोध उत्पन्न कर दिया। भोजन किया जाय तो कैसे?

दैत्य वर्ग के लोग हाथ ऊपर ले जाते। ऊपर से ग्रास पटकते। कोई मुँह में जाता कोई इधर-उधर गिरता। पूरा चेहरा गन्दा हो गया। पानी पर से गिराया तो उसने सारे वस्त्र भिगो दिये। इस स्थिति में उन्हें भूखे रहकर दुखी मन से उठना पड़ा।

यही प्रयोग देव वर्ग के साथ भी हुआ। उनने अपने सहज स्वभाव के अनुसार हल निकाल लिया। एक ने अपने हाथ से तोड़ा उसे दूसरे में मुँह में दिया। दूसरे ने तीसरे के मुँह में। इस प्रकार पूरी मंडली ने उसी कार्यवाई से भोजन कर लिया। पानी इसी प्रकार एक ने दूसरे को पिला दिया। सभी प्रसन्न थे और पूरा भोजन खाकर उठे।


ब्रह्मा जी ने दोनों को बुलाया। कहा- “तुम लोगों के प्रश्न का उत्तर मिल गया। जो सिर्फ अपने लिए ही सोचता और करता है वह असंतुष्ट रहता है तथा समय-समय पर अपमानित होता है। पर जिसे दूसरों के हित का ध्यान है उसे संतोष भी मिलता है यश भी और सम्मान भी। इस कसौटी पर देव खरे उतरे है।”


Sep 7, 2014

जीवन में सफलता की कुंजी है ये तीन बातें!!- Incredible Stories From Ramayana

मरने से पहले रावण ने लक्ष्मण को बताई थी ये 3 बातें (Raavan's Three Life Lessons To Lakshman)
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जिस समय रावण मरणासन्न अवस्था में था, उस समय भगवान श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा कि इस संसार से नीति, राजनीति और शक्ति का महान् पंडित विदा ले रहा है, तुम उसके पास जाओ और उससे जीवन की कुछ ऐसी शिक्षा ले लो जो और कोई नहीं दे सकता।

श्रीराम की बात मानकर लक्ष्मण मरणासन्न अवस्था में पड़े रावण के सिर के नजदीक जाकर खड़े हो गए। रावण ने कुछ नहीं कहा। लक्ष्मणजी वापस रामजी के पास लौटकर आए...तब भगवान ने कहा कि यदि किसी से ज्ञान प्राप्त करना हो तो उसके चरणों के पास खड़े होना चाहिए न कि सिर की ओर।

यह बात सुनकर लक्ष्मण जाकर इस बार रावण के पैरों की ओर खड़े हो गए।

उस समय महापंडित रावण ने लक्ष्मण को तीन बातें बताई जो जीवन में सफलता की कुंजी है:

1. पहली बात जो रावण ने लक्ष्मण को बताई वह ये थी कि शुभ कार्य जितनी जल्दी हो कर डालना और अशुभ को जितना टाल सकते हो टाल देना चाहिए यानी शुभस्य शीघ्रम्। मैंने श्रीराम को पहचान नहीं सका और उनकी शरण में आने में देरी कर दी,इसी कारण मेरी यह हालत हुई।

2. दूसरी बात यह कि अपने प्रतिद्वंद्वी, अपने शत्रु को कभी अपने से छोटा नहीं समझना चाहिए, मैं यह भूल कर गया। मैंने जिन्हें साधारण वानर और भालू समझा उन्होंने मेरी पूरी सेना को नष्ट कर दिया। मैंने जब ब्रह्माजी से अमरता का वरदान मांगा था तब मनुष्य और वानर के अतिरिक्त कोई मेरा वध न कर सके ऐसा कहा था क्योंकि मैं मनुष्य और वानर को तुच्छ समझता था। यही मेरी गलती हुई।

3. रावण ने लक्ष्मण को तीसरी और अंतिम बात ये बताई कि अपने जीवन का कोई राज हो तो उसे किसी को भी नहीं बताना चाहिए। यहां भी मैं चूक गया क्योंकि विभीषण मेरी मृत्यु का राज जानता था। ये मेरे जीवन की सबसे बड़ी गलती थी।

आप भी इन बातों को गाँठ बांध कर रख लें और इन्हे समय समय पर याद करते रहें। 

P.S.We believe that these three lessons from great pandit Raavana has a lot to learn for everyone. Do let us know your feedback about this incredible moral story from Ramayana.

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Sep 3, 2014

संत कबीर के दोहे - भाग 10 | Kabeer Ke Dohe - Part 10 |

Sant Kabeer Ke Dohe- Attributes of Modern Age(Kalyug)
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कलि का स्वामी लोभिया, पीतली धरी खटाई |
राज-दुबारा यू फिराई, ज्यू हरिहाई गाई ||[1]

In this Kali Age he who calls himself Swami has become greedy. He looks like a brass utensil with sour items. He seeks protection of the ruler just like a cow that rushes on seeing a green pasture.
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कलि  का स्वामी लोभिया, मनसा धरी बढाई |
देही पैसा ब्याज कौ, लेखा कर्ता जाई ||[2]

The Swami of Kali Age expects many greetings. He lends money and is busy with the book keeping.
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ब्रह्मन गुरू जगत का, साधु का गुरू नाही |
उर्झी-पुरझी करी मरी राह्य, चारिउ बेडा माही ||[3]

A Brahmin may be a guru of the world but he is not a Guru of a good man. The Brahmin is always involved with the interpretation of Vedas and he dies doing that.

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चतुराई सूवई पड़ी, सोई पंजर माही |
फिरी प्रमोधाई आन कौ, आपन समझाई नाही ||[4]

A parrot repeats whatever knowledge is taught but he doesn’t know how to set himself free from his cage. People have gained much knowledge today but they fail to set themselves free.

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तीरथ करी करी जाग मुआ, दूंघे पानी नहाई |
रामही राम जापन्तदा, काल घसीट्या जाई ||[5]

People go to many places as pilgrims. They take bath at such places. They are always chanting name of God but still they are being dragged to death by time.

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कबीर इस संसार को, समझौ कई बार |
पूंछ जो पकडई भेड़ की, उत्रय चाहाई पार ||[6]

Kabir is fed up with telling people that they should shun foolish means of worshiping. People think that they will cross the ocean of transmigration by holding to a sheep’s tail.

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कबीर मन फुल्या फिरे, कर्ता हु मई धम्म |
कोटी क्रम सिरी ले चल्या, चेत ना देखई भ्रम ||[7]

Kabir says that people swell with the thought that so much merit is being earned. They fail to see that they have created many action seeds due to such ego. They should wake up and remove this delusion.

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कबीर भाथी कलाल की, बहुतक बैठे आई |
सिर सौपे सोई पेवाई,नही तौऊ पिया ना जाई ||[8]

Welcome to the nectar shop. There are many sitting over. One should hand over one’s head and get a glass of nectar.
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कबीर हरी रस यो पिया, बाकी रही ना थाकी |
पाका कलस कुम्भार का, बहुरी ना चढाई चाकी ||[9]

Kabir savored the juice of devotion. There is no flavor other than devotion now. Once a pitcher makes his pot and bakes it, that pot again can’t be put on the wheel.

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हरी-रस पीया जानिये, जे कबहु ना जाई खुमार |
मैमन्ता घूमत रहाई, नाही तन की सार ||[10]

Those who savor the juice of devotion live in that flavor forever. They don’t have ego and are least bothered about sensual pleasures.
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संत कबीर के दोहों की अन्य प्रकाशित कड़ियाँ 

  1. संत कबीर के दोहे - भाग 9 | Kabeer Ke Dohe - Part 9|
  2. संत कबीर के दोहे - भाग 7 | Kabeer Ke Dohe - Part 7 | श्रेष्ठ हिंदी कवितायेँ | Fabulous Hindi Poems  
  3. संत कबीर के दोहे - भाग 4 | Kabeer Ke Dohe - Part 4 | श्रेष्ठ हिंदी कवितायेँ | Fabulous Hindi Poems 
  4. संत कबीर के दोहे - भाग 5 | Kabeer Ke Dohe - Part 5 | श्रेष्ठ हिंदी कवितायेँ | Fabulous Hindi Poems
  5. संत कबीर के दोहे - भाग 6 | Kabeer Ke Dohe - Part 6 | श्रेष्ठ हिंदी कवितायेँ | Fabulous Hindi Poems
Note: We hope you enjoyed learned the verses of Sant Kabeer Ke Dohe. We invite you to contribute here. If you have any fabulous hindi stories, hindi inspirational poems, Hindi self-help articles or hindi quotations and you want to share it with all of us then please send it to nisheeth@hindisahityadarpan.in and we would publish them with your name and photograph. 

Sep 2, 2014

ज्ञान अद्भुत धन है - भर्तृहरि-Bhartrihari Neeti Shataka-Shlok-16

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हर्तुर्याति न गोचरं किमपि शं पुष्णाति यत्सर्वदा
    ह्यर्थिभ्यः प्रतिपाद्यमानमनिशं प्राप्नोति वृद्धिं पराम् ।
कल्पान्तेष्वपि न प्रयाति निधनं विद्याख्यमन्तर्धन
    येषां तान्प्रति मानमुज्झत नृपाः कस्तैः सह स्पर्धते ॥[16]

Hindi Translation Of Bhartrihari Neeti Shatak Shlok About Learned Men

ज्ञान अद्भुत धन है,  ये आपको एक ऐसी अद्भुत ख़ुशी देती है जो कभी समाप्त नहीं होती। जब कोई आपसे ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा लेकर आता है और आप उसकी मदद करते हैं तो आपका ज्ञान कई गुना बढ़  जाता है।शत्रु और आपको लूटने वाले भी इसे छीन नहीं पाएंगे यहाँ तक की ये इस दुनिया के समाप्त  हो जाने पर भी ख़त्म नहीं होगी। 

अतः हे राजन! यदि आप किसी ऐसे ज्ञान के धनी व्यक्ति को देखते हैं तो अपना अहंकार त्याग दीजिये और समर्पित हो जाइए, क्यूंकि ऐसे विद्वानो से  प्रतिस्पर्धा करने का कोई अर्थ नहीं है।

English Translation of Neeti Shatak Shlok About Knowledge

Oh Kings cast off your pride before those who possess the secret treasure of wisdom. A treasure which remains invisible to a thief and  which always augments some unique indescribable happiness, which largely increases even though constantly given to those who desire it and which  is not destroyed even at the time of universal of destruction. Who can ever compete with such persons?

इस श्लोक से क्या सीखें

भले ही हम जीवन मे कितने ही बड़े क्यूं ना हो जाएं हमे अपने धन का अभिमान नहीं करना चाहिये, और धन की तुलना ज्ञान से नहीं करनी चाहिये तथा अगर हम किसी ज्ञानी व्यक्ति से मिलते हैं तो हमे अपना अहम त्याग कर उनसे ज्ञान अर्पण करना चहिये। हमे सीखने मे किसी भी प्रकार की हिचकिचाहट नहीं दिखानी चाहिये तथा हमे अपने ज्ञान को भी दूसरों के साथ बांटना चाहिये क्योंकि ज्ञान बांटने से कयी गुना बढ़ता है।  

Aug 29, 2014

परिस्थितियों को जाने बिना कोई भी निर्णय लेने से बचें!! [Moral Hindi Stories]

Hitopadesh Hindi Story About The Snake And Mongoose
एक व्यक्ति ने घर की रक्षा और सर्पों से बचने के लिए नेवला पाला। नेवला बड़ा स्वामिभक्त स्वभाव का था। पति−पत्नी दोनों ही किसी काम से बाहर निकल जाते तो वह पूरी तरह घर की चौकीदारी करता।

एक दिन गृह स्वामिनी कुँए से जल भरने गयी। बच्चे को सोता छोड़ गयी। इतने में एक भयंकर काला नाग निकला, वह बच्चे को डसने ही वाला था, कि नेवले ने उसके टुकड़े−टुकड़े कर दिये। बच्चा यथावत जीवित बना रहा।

गृह स्वामिनी पानी लेकर लौटी, तो उसने घर के द्वार पर बैठे नेवले को देखा कि उसके मुँह से खून लिपटा हुआ है। बात की पूरी जाँच−पड़ताल किये बिना ही यह अनुमान लगा लिया कि इसने मेरे बच्चे को मार डाला। आवेश में उससे इतना भी न बन पड़ा कि वस्तुस्थिति को जाने और जाँचे। उसने जल से भरा घड़ा नेवले के ऊपर पटक दिया। वह तत्काल चूर−चूर हो गया।

घर में घुसकर देखा, बच्चा हंस−खेल रहा था। सर्प मरा पड़ा है। वस्तुस्थिति का अनुमान लगाया, तो उसने अपने आपको बहुत धिक्कारा और आवेश की आतुरता में होने वाले अनर्थ को समझा।

Moral Of The Story
हमारे जीवन में भी ऐसी कई घटनाएँ अक्सर होती हैं जब हम बिना सोचे विचारे और सच्चाई के जाने बिना कुछ ऐसा कर जाते हैं जिसकी वजह से हमें जिंदगी भर पछताना  पड़ता है। अतः परिस्थितियों को ठीक से जाने बिना कोई भी निर्णय लेने से बचें !!

आप सभी को गणेश चतुर्थी की ढेरों शुभकामनायें !!!

Other Moral Hindi Stories Published Earlier

Aug 26, 2014

धैर्य हर लक्ष्य प्राप्ति में सफलता सुनिश्चित करता है| [ Motivational Hindi Story From The Life Of Shivaji Maharaj ]

Veer Shivaji Hindi Story About Patience

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अपनी सेना से बिछुड़कर शिवाजी एक ऐसी स्थान पर जा पहुँचे जहाँ दूर-दूर तक आबादी दिखाई न देती थी। कुछ अँधेरा हो चला था। तभी कुछ दूर पर उन्होंने दीमक का मन्द प्रकाश देखा। वे उधर गये और एक झोपड़ी के सम्मुख आ खड़े हुये। एक बुढ़िया बाहर आई और उन अभ्यागत को झोपड़ी के अन्दर ले गई। शिवाजी थके होने के साथ-साथ भूखे भी थे। बुढ़िया ने यह अनुभव कर लिया। उसने हाथ मुँह धोने के लिए गर्म पानी दिया और बैठने के लिए चटाई बिछा दी। शिवाजी हाथ मुँह धोकर आराम से बैठ गये। कुछ ही समय पश्चात बुढ़िया ने एक थाली में पकी हुई रोटियाँ परोस कर उनके सम्मुख रख दीं।

शिवाजी असहनीय रूप से भूखे थे। तुरन्त रोटियों का बड़ा सा कौर भरा। तभी ओ माँ ! हाथ झटकने लगे। रोटियाँ बहुत गर्म थीं।

बुढ़िया ने देखा तो बाली-”तू भी शिवा जैसे स्वभाव का मालूम होता है।” शिवाजी ने पूछा-”माता ! तूने शिवा से मेरी तुलना किस आधार पर की ?”

बुढ़िया बोली-”जिस प्रकार शिवा आस-पास के छोटे किले न जीकर बड़े-बड़े किले जीतने की उतावली करता है उसी प्रकार तूने भी किनारे-किनारे की ठंडी रोटियों को खाना शुरू न करके बीच में से बड़ा कौर भरकर हाथ जला लिया ! बेटा उतावली से काम बनता नहीं बिगड़ता है। मनुष्य की उन्नति के लिए छोटे-छोटे कदम बढ़ाते हुए सावधानी और धैर्य के साथ आगे बढ़ना चाहिए। उतावली के साथ बड़े-बड़े कदम उठाकर कोई बड़ा लक्ष्य नहीं पाया जा सकता। जिस दिन शिवा छोटे-छोटे किलों से अपना विजय-अभियान प्रारम्भ करेगा उसी दिन से उसे कभी पीछे हटने की आवश्यकता न होगी, और एक दिन ऐसा आयेगा जब वह अपने मनोनीत लक्ष्य को प्राप्त कर लेगा।

शिवाजी ने बुढ़िया की सीख गाँठ बाँध ली, जिसके फलस्वरूप उन्होंने इतिहास में गौरव पूर्ण स्थान प्राप्त कर लिया।

Moral Of The Story:
इस कहानी से हमें ये शिक्षा मिलती है कि किसी भी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उतावला न होकर जो धैर्यवान व्यक्ति दृढ़तापूर्वक धीरे-धीरे आगे बढ़ते हैं वे अवश्य सफल होते हैं। इसके विपरित जो व्यक्ति छलाँग लगाकर जल्दी ही लक्ष्य प्राप्त करने की जल्दीबाजी करते हैं वे हमेशा असफल रहकर उपहास के पात्र  बन जाते हैं।

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