नक़ाबो की बिक्री ~ अमर सिंह

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नक़ाबो की बिक्री ~ अमर सिंह

वो चौराहे पर बेच रहा था ढेरों नक़ाब,       
                                  चारों  और खरीदारों की थी भीड़ बेहिसाब,                                                     

हरेक कोई  चाह  रहा था एक नक़ाब अपने लिए,
बनावटी आवरण ओढ़कर सफल ज़िन्दगी जीने के लिए ,

मैंने  भी उत्सुकता से अपना हाथ बढ़ा  दिया ,
उसने भी मेरे मायूस चेहरे को भांप लिया ,

वो बोला ",बाबूजी आपको कौन -सा चाहिए ,
देश-भक्ति  ,ईमानदारी,समाज –सेवा या सज्जनता  चाहिए,

ये नक़ाब आपको रातोंरात ऊंचाइयों तक पहुंचा  देंगे ,
जो सीधी उंगली से न मिले ,टेडी उंगली से दिला देंगे ,

मैंने जोश में पूछा " आज डिमांड  मैं  क्या चल रहा है,
और बाजार में किस नक़ाब से  भाग्य  का सितारा बदल रहा है,

उसने धीरे से कान में कहा" देशभक्ति ज़ोरो से बिक रही हैं,
क्योंकि आज के नेताओं की रोटी इसी पर  सिक रही हैं ,

ईमानदारी का नक़ाब भी बहुत जरुरी  हो गया है ,
अंदर ही अंदर खाने-कमाने  का चलन जो शुरू  हो गया हैं ,

समाज सेवा का नक़ाब थोड़ा महंगा पर बिक रहा हैं ,
इससे  उद्योगपतियों और हस्तियों का नाम चमक रहा है ,

सज्जनता का क्या कहना, यूँ तो यह  सब जगह  हिट है ,
पर देश के तथाकथित  बाबाओं पर सबसे ज्यादा फिट हैं ,

मैं उसकी बातो सुनकर अचम्भे में पड गया ,
उसके सच और झूठ के जाल में और उलझ गया ,

मैंने बड़ी मासूमियत से कहा" मेरे  जैसे आम आदमी को  इनसे क्या लेना है ,
मुझे तो  इस महंगाई  में  दो रोटी के लिए हमेशा संघर्ष करना है ,

वो हँसकर बोला ,"क्या साहब, मुझे  ही उल्लू  बना रहे हो ,
आम आदमी का नक़ाब पहनकर मुझे टोपी पहना रहे हो ,

पिछले इलेक्शन में खूब बिक था ये आम आदमी का नक़ाब ,
खूब लगे थे नारे ,सरकर भी बनी  पर नहीं आया कोई बदलाव,

साहब ,सच कहूँ ,इस दुनिया मैं केवल नाकाबों का ही मोल है ,
सच्चाई ,ईमानदारी ,देशभक्ति , आज सब में झोल ही झोल हैं| 
~अमर सिंह 

कवि परिचय:


मेरा नाम अमर सिंह हैं I मेरी उम्र 43 वर्ष हैंI  मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी में स्नातकोत्तर की पढाई की हैं I मैं पहले अंग्रेज़ी में कविताएं लिखता था I अभी कुछ समय से हिंदी में कविताएं लिखना आरम्भ किया हैं Iवर्तमान में , मै लोक सभा सचिवालय में संपादक के पद पर कार्यरत हूँ I मुझे सामयिक विषयों पर कविताँए लिखना पसंद हैं I

COMMENTS

BLOGGER: 1
  1. बेनामी9/17/2016 1:19 pm

    Yeh Kavita mujhe pasand aai hai Kyo Ki iss Kavita Mai Kavi nai aam shabdo ka prayog kiya hai tatha yai aaj Kai samaj Ki istithi ko durshati hai.

    जवाब देंहटाएं
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