माँ कोख में ही क्यों मुझे तुम मिटा देतीं भला - सिद्धार्थ त्रिपाठी

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माँ कोख में ही क्यों मुझे तुम मिटा देतीं भला ।
खोजा बहुत खोजा बहुत कोई नहीं कारण मिला ।।
तुम ही बता दो माँ मेरी यदि जन्म न लें बेटियाँ ।
व्यर्थ भइया दौज होगी व्यर्थ होंगीं राखियाँ ।।
संसार के सब नेह नातों का हमीं आधार हैं ।
पुत्री बिना परिवार में सूने सभी त्योहार हैं ।। 
संसार का हम सार हैं संसार से क्यों डर रहीं ?।
जन्मी स्वयं जिस रूप में उस से घृणा क्यों कर रहीं।।
टकरा गया था प्रश्न जा माँ के हृदय के छोर से ।
नीर बन बहने लगा उसके दृगों की कोर से ।।
क्या कहूं कैसे कहूं अपने हृदय की मैं व्यथा ।
बेटियों की दुर्दशा की रोज सुनती हूं कथा ।।
तुझको मिटा कर मैं मिटाती हूं जगत आधार को
तुझको मिटा कर मैं मिटाती भू के निश्छल प्यार को ।।
जन्म तेरा हो यहां खुशियाँ मनें ढोलक बजे ।
एक दिन वो आये तू दुल्हन बने संवरे सजे ।।
चाहती में खुश रहे तू हर समय हर हाल में ।
कांपती सुन आत्मा बेटी जली ससुराल में ।।
पोषण तेरा न बोझ है न जन्म ही अभिशाप है ।
कोख में तेरा मिटाना मैं जानती हूं पाप है ।।
जान कर भी पाप करती क्या कहूं सब व्यर्थ है ।
बस बात इतनी जान ले तू मां तेरी असमर्थ है ।।


रचनाकार- सिद्धार्थ त्रिपाठी, उरई
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कवि परिचय 

नाम– सिद्धार्थ त्रिपाठी
पिता का नाम– श्री यज्ञदत्त त्रिपाठी एडवोकेट
माता का नाम– श्रीमती कृष्णा त्रिपाठी
जन्म तिथि – 01-06-1970
जन्म स्थान– उरई
पत्नी का नाम– श्रीमती सविता त्रिपाठी
निवास स्थान– मण्डी के सामने राठ रोड; उरई (जालौन) उ.प्र.
शिक्षा– स्नातक
व्यवसाय– आफसैट प्रिंटिंग प्रेस
रचनायें– फुटकर कवितायें, जीवन मेला लम्बी कविता एवं कुछ बुन्देली गीत
सम्मान– जवाहर नवोदय विद्यालय उरई द्वारा साहित्य मणि सम्मान
सम्प्रति– महासचिव अखिल भारतीय नवोदित साहित्यकार परिषद उरई (जालौन) सम्पर्क सूत्र– मोबाइल 08795675221



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COMMENTS

BLOGGER: 6
  1. बहुत अच्छी... साधुवाद.

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  2. मर्मस्पर्शी शब्दों में, मज़बूर मातृत्व की व्यथा का संवेदनात्मक और यथादशा चित्रण उक्त कविता के माध्यम से किया गया है। हमारे देश में सही में दहेज के साथ-साथ कविता में वर्णित कारण भी कमोबेश जिम्मेदार है कन्या भ्रूण हत्या का। जब तक आत्मपरिवर्तन की राह पर नहीं चला जाता है, तब तक देश की आध्यात्मिक, सामाजिक, राजनैतिक व सांस्कृतिक उन्नति और पुनरुथान के व्यापक व महान लक्ष्य की प्राप्ति नहीं की जा सकती है।
    सिद्धार्थ जी की यह मौलिक और भावना प्रधान रचना वस्तुतः यह प्रतीति कराती है कि देश में अभी भी सामाजिक शुचिता और राष्ट्रीय कल्याण हेतु समर्पित कवियों तथा रचनाकारों की कमी नहीं है, जो शब्दों के माध्यम से व्याप्त कुरीतियों के अंधानुकरण, देश में आक्रांताओं के बढते कदमों, भ्रष्ट कानून व्यवस्था, नेताओं की असंवेदनशीलता के विरुद्ध निर्भय और बेधडक होकर नित्य लिखते रहते हैं तथा अपने कलम रूपी हथियार से मज़बूर और त्रस्त जनता के दु:खों व पीडाओं को सामने उजागर करते हैं।
    लेखक के लिये हृदय से साधुवाद।

    जवाब देंहटाएं
  3. aur kch shabd nai h iske liye bs ek hi h.... behtarin...

    जवाब देंहटाएं
  4. aur kch shabd nai h iske liye bs ek hi h.... behtarin...

    जवाब देंहटाएं
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