Most Famous Quotations By Swami Vivekananda - Part 4 | स्वामी विवेकानन्द द्वारा कही गयीं उक्तियाँ - भाग 4

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§  बच्चेजब तक हृदय में उत्साह एवं गुरू तथा ईश्वर में विश्वास - ये तीनों वस्तुएम रहेंगी - तब तक तुम्हें कोई भी दबा नहीं सकता। मैं दिनोदिन अपने हृदय में शक्ति के विकास का अनुभव कर रहा हूँ। हे साहसी बालकोंकार्य करते रहो। (वि.स. ४/३३२)

-स्वामी विवेकानन्द

§  आओ हम नामयश और दूसरों पर शासन करने की इच्छा से रहित होकर काम करें। कामक्रोध एंव लोभ -- इस त्रिविध बन्धन से हम मुक्त हो जायें और फिर सत्य हमारे साथ रहेगा। (वि.स. ४/३३८)

-स्वामी विवेकानन्द

§  न टालोन ढूँढों -- भगवान अपनी इच्छानुसार जो कुछ भेहेउसके लिए प्रतिक्षा करते रहोयही मेरा मूलमंत्र है। (वि.स. ४/३४८)

-स्वामी विवेकानन्द

§  शक्ति और विशवास के साथ लगे रहो। सत्यनिष्ठापवित्र और निर्मल रहोतथा आपस में न लडो। हमारी जाति का रोग ईर्ष्या ही है। (वि.स. ४/३६९)

-स्वामी विवेकानन्द

§  एक ही आदमी मेरा अनुसरण करेकिन्तु उसे मृत्युपर्यन्त सत्य और विश्वासी होना होगा। मैं सफलता और असफलता की चिन्ता नहीं करता। मैं अपने आन्दोलन को पवित्र रखूँगाभले ही मेरे साथ कोई न हो। कपटी कार्यों से सामना पडने पर मेरा धैर्य समाप्त हो जाता है। यही संसार है कि जिन्हें तुम सबसे अधिक प्यार और सहायता करोवे ही तुम्हे धोखा देंगे। (वि.स. ४/३७७)

-स्वामी विवेकानन्द

§  मेरा आदर्श अवश्य ही थोडे से शब्दों में कहा जा सकता है - मनुष्य जाति को उसके दिव्य स्वरूप का उपदेश देनातथा जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उसे अभिव्यक्त करने का उपाय बताना। (वि.स. ४/४०७)

-स्वामी विवेकानन्द

§  जब कभी मैं किसी व्यक्ति को उस उपदेशवाणी (श्री रामकृष्ण के वाणी) के बीच पूर्ण रूप से निमग्न पाता हूँजो भविष्य में संसार में शान्ति की वर्षा करने वाली हैतो मेरा हृदय आनन्द से उछलने लगता है। ऐसे समय मैं पागल नहीं हो जाता हूँयही आश्चर्य की बात है। (वि.स. १/३३४६ फरवरी१८८९)

-स्वामी विवेकानन्द

§  'बसन्त की तरह लोग का हित करते हुए' - यहि मेरा धर्म है। "मुझे मुक्ति और भक्ति की चाह नहीं। लाखों नरकों में जाना मुझे स्वीकार हैबसन्तवल्लोकहितं चरन्तः- यही मेरा धर्म है।" (वि.स.४/३२८)

-स्वामी विवेकानन्द

§  हर काम को तीन अवस्थाओं में से गुज़रना होता है -- उपहासविरोध और स्वीकृति। जो मनुष्य अपने समय से आगे विचार करता हैलोग उसे निश्चय ही ग़लत समझते है। इसलिए विरोध और अत्याचार हम सहर्ष स्वीकार करते हैंपरन्तु मुझे दृढ और पवित्र होना चाहिए और भगवान् में अपरिमित विश्वास रखना चाहिएतब ये सब लुप्त हो जायेंगे। (वि.स.४/३३०)

-स्वामी विवेकानन्द

§  यदि कोई भंगी हमारे पास भंगी के रूप में आता हैतो छुतही बिमारी की तरह हम उसके स्पर्श से दूर भागते हैं। परन्तु जब उसके सीर पर एक कटोरा पानी डालकर कोई पादरी प्रार्थना के रूप में कुछ गुनगुना देता है और जब उसे पहनने को एक कोट मिल जाता है-- वह कितना ही फटा-पुराना क्यों न हो-- तब चाहे वह किसी कट्टर से कट्टर हिन्दू के कमरे के भीतर पहुँच जायउसके लिए कहीं रोक-टोक नहींऐसा कोई नहींजो उससे सप्रेम हाथ मिलाकर बैठने के लिए उसे कुर्सी न दे! इससे अधिक विड्म्बना की बात क्या हो सकता हैआइएदेखिए तो सहीदक्षिण भारत में पादरी लोग क्या गज़ब कर रहें हैं। ये लोग नीच जाति के लोगों को लाखों की संख्या मे ईसाई बना रहे हैं। ...वहाँ लगभग चौथाई जनसंख्या ईसाई हो गयी है! मैं उन बेचारों को क्यों दोष दूँहें भगवानकब एक मनुष्य दूसरे से भाईचारे का बर्ताव करना सीखेगा। (वि.स.१/३८५)

-स्वामी विवेकानन्द

§  प्रायः देखने में आता है कि अच्छे से अच्छे लोगों पर कष्ट और कठिनाइयाँ आ पडती हैं। इसका समाधान न भी हो सकेफिर भी मुझे जीवन में ऐसा अनुभव हुआ है कि जगत में कोई ऐसी वस्तु नहींजो मूल रूप में भली न हो। ऊपरी लहरें चाहे जैसी होंपरन्तु वस्तु मात्र के अन्तरकाल में प्रेम एवं कल्याण का अनन्त भण्डार है। जब तक हम उस अन्तराल तक नहीं पहुँचतेतभी तक हमें कष्ट मिलता है। एक बार उस शान्ति-मण्डल में प्रवेश करने पर फिर चाहे आँधी और तूफान के जितने तुमुल झकोरे आयेंवह मकानजो सदियों की पुरानि चट्टान पर बना हैहिल नहीं सकता। (वि.स.१/३८९)

-स्वामी विवेकानन्द

§  यही दुनिया है! यदि तुम किसी का उपकार करोतो लोग उसे कोई महत्व नहीं देंगेकिन्तु ज्यों ही तुम उस कार्य को वन्द कर दोवे तुरन्त (ईश्वर न करे) तुम्हे बदमाश प्रमाणित करने में नहीं हिचकिचायेंगे। मेरे जैसे भावुक व्यक्ति अपने सगे - स्नेहियों द्वरा सदा ठगे जाते हैं।

-स्वामी विवेकानन्द

§  मेरी केवल यह इच्छा है कि प्रतिवर्ष यथेष्ठ संख्या में हमारे नवयुवकों को चीन जापान में आना चाहिए। जापानी लोगों के लिए आज भारतवर्ष उच्च और श्रेष्ठ वस्तुओं का स्वप्नराज्य है। और तुम लोग क्या कर रहे हो? ... जीवन भर केवल बेकार बातें किया करते होव्यर्थ बकवाद करने वालोतुम लोग क्या होआओइन लोगों को देखो और उसके बाद जाकर लज्जा से मुँह छिपा लो। सठियाई बुध्दिवालोतुम्हारी तो देश से बाहर निकलते ही जाति चली जायगी! अपनी खोपडी में वर्षों के अन्धविश्वास का निरन्तर वृध्दिगत कूडा-कर्कट भरे बैठेसैकडों वर्षों से केवल आहार की छुआछूत के विवाद में ही अपनी सारी शक्ति नष्ट करनेवालेयुगों के सामाजिक अत्याचार से अपनी सारी मानवता का गला घोटने वालेभला बताओ तो सहीतुम कौन होऔर तुम इस समय कर ही क्या रहे हो? ...किताबें हाथ में लिए तुम केवल समुद्र के किनारे फिर रहे हो। तीस रुपये की मुंशी - गीरी के लिए अथवा बहुत हुआतो एक वकील बनने के लिए जी - जान से तडप रहे हो -- यही तो भारतवर्ष के नवयुवकों की सबसे बडी महत्वाकांक्षा है। तिस पर इन विद्यार्थियों के भी झुण्ड के झुण्द बच्चे पैदा हो जाते हैंजो भूख से तडपते हुए उन्हें घेरकर रोटी दोरोटी दो चिल्लाते रहते हैं। क्या समुद्र में इतना पानी भी न रहा कि तुम उसमें विश्वविद्यालय के डिप्लोमागाउन और पुस्तकों के समेत डूब मरो ? आओमनुष्य बनो! उन पाखण्डी पुरोहितों कोजो सदैव उन्नत्ति के मार्ग में बाधक होते हैंठोकरें मारकर निकाल दोक्योंकि उनका सुधार कभी न होगाउन्के हृदय कभी विशाल न होंगे। उनकी उत्पत्ति तो सैकडों वर्षों के अन्धविश्वासों और अत्याचारों के फलस्वरूप हुई है। पहले पुरोहिती पाखंड को ज़ड - मूल से निकाल फेंको। आओमनुष्य बनो। कूपमंडूकता छोडो और बाहर दृष्टि डालो। देखोअन्य देश किस तरह आगे बढ रहे हैं। क्या तुम्हे मनुष्य से प्रेम हैयदि 'हाँतो आओहम लोग उच्चता और उन्नति के मार्ग में प्रयत्नशील हों। पीछे मुडकर मत देखोअत्यन्त निकट और प्रिय सम्बन्धी रोते होंतो रोने दोपिछे देखो ही मत। केवल आगे बढते जाओ। भारतमाता कम से कम एक हज़ार युवकों का बलिदान चाहती है -- मस्तिष्क - वाले युवकों कापशुओं का नहीं। परमात्मा ने तुम्हारी इस निश्चेष्ट सभ्यता को तोडने के लिए ही अंग्रेज़ी राज्य को भारत में भेजा है... ( वि.स.१/३९८-९९)

-स्वामी विवेकानन्द

§  न संख्या-शक्तिन धनन पाण्डित्यन वाक चातुर्यकुछ भी नहींबल्कि पवित्रताशुध्द जीवनएक शब्द में अनुभूतिआत्म-साक्षात्कार को विजय मिलेगी! प्रत्येक देश में सिंह जैसी शक्तिमान दस-बारह आत्माएँ होने दोजिन्होने अपने बन्धन तोड डाले हैंजिन्होने अनन्त का स्पर्श कर लिया हैजिन्का चित्र ब्रह्मनुसन्धान में लीन हैजो न धन की चिन्ता करते हैंन बल कीन नाम की और ये व्यक्ति ही संसार को हिला डालने के लिए पर्याप्त होंगे। (वि.स.४/३३६)

-स्वामी विवेकानन्द

§  यही रहस्य है। योग प्रवर्तक पंतजलि कहते हैं, " जब मनुष्य समस्त अलौकेक दैवी शक्तियों के लोभ का त्याग करता हैतभी उसे धर्म मेघ नामक समाधि प्राप्त होती है। वह प्रमात्मा का दर्शन करता हैवह परमात्मा बन जाता है और दूसरों को तदरूप बनने में सहायता करता है। मुझे इसीका प्रचार करना है। जगत् में अनेक मतवादों का प्रचार हो चुका है। लाखों पुस्तकें हैंपरन्तु हाय! कोई भी किंचित् अंश में प्रत्य्क्ष आचरण नहीं करता। (वि.स.४/३३७)

-स्वामी विवेकानन्द

§  एक महान रहस्य का मैंने पता लगा लिया है -- वह यह कि केवल धर्म की बातें करने वालों से मुझे कुछ भय नहीं है। और जो सत्यद्र्ष्ट महात्मा हैंवे कभी किसी से बैर नहीं करते। वाचालों को वाचाल होने दो! वे इससे अधिक और कुछ नहीं जानते! उन्हे नामयशधनस्त्री से सन्तोष प्राप्त करने दो। और हम धर्मोपलब्धिब्रह्मलाभ एवं ब्रह्म होने के लिए ही दृढव्रत होंगे। हम आमरण एवं जन्म-जन्मान्त में सत्य का ही अनुसरण करेंगें। दूसरों के कहने पर हम तनिक भी ध्यान न दें और यदि आजन्म यत्न के बाद एकदेवल एक ही आत्मा संसार के बन्धनों को तोडकर मुक्त हो सके तो हमने अपना काम कर लिया। (वि.स. ४/३३७)

-स्वामी विवेकानन्द

§  जो सबका दास होता हैवही उन्का सच्चा स्वामी होता है। जिसके प्रेम में ऊँच - नीच का विचार होता हैवह कभी नेता नहीं बन सकता। जिसके प्रेम का कोई अन्त नहीं हैजो ऊँच - नीच सोचने के लिए कभी नहीं रुकताउसके चरणों में सारा संसार लोट जाता है। (वि.स. ४/४०३)

-स्वामी विवेकानन्द

§  वत्सधीरज रखोकाम तुम्हारी आशा से बहुत ज्यादा बढ जाएगा। हर एक काम में सफलता प्राप्त करने से पहले सैंकडो कठिनाइयों का सामना करना पडता है। जो उद्यम करते रहेंगेवे आज या कल सफलता को देखेंगे। परिश्रम करना है वत्सकठिन परिश्रम्! काम कांचन के इस चक्कर में अपने आप को स्थिर रखनाऔर अपने आदर्शों पर जमे रहनाजब तक कि आत्मज्ञान और पूर्ण त्याग के साँचे में शिष्य न ढल जाय निश्चय ही कठिन काम है। जो प्रतिक्षा करता हैउसे सब चीज़े मिलती हैं। अनन्त काल तक तुम भाग्यवान बने रहो। (वि.स. ४/३८७)

-स्वामी विवेकानन्द

§  अकेले रहोअकेले रहो। जो अकेला रहता हैउसका किसीसे विरोध नहीं होतावह किसीकी शान्ति भंग नहीं करतान दूसरा कोई उसकी शान्ति भंग करता है। (वि.स. ४/३८१)

-स्वामी विवेकानन्द

§  मेरी दृढ धारणा है कि तुममें अन्धविश्वास नहीं है। तुममें वह शक्ति विद्यमान हैजो संसार को हिला सकती हैधीरे - धीरे और भी अन्य लोग आयेंगे। 'साहसीशब्द और उससे अधिक 'साहसीकर्मों की हमें आवश्यकता है। उठो! उठो! संसार दुःख से जल रहा है। क्या तुम सो सकते होहम बार - बार पुकारेंजब तक सोते हुए देवता न जाग उठेंजब तक अन्तर्यामी देव उस पुकार का उत्तर न दें। जीवन में और क्या हैइससे महान कर्म क्या है? (वि.स. ४/४०८)

-स्वामी विवेकानन्द

स्वामी विवेकानन्द के अनमोल विचारों की पहले प्रकाशित की गई कड़ियाँ:

  1. १. स्वामी विवेकानन्द द्वारा कही गयीं उक्तियाँ | Great Quotations By Swami Vivekananda
  2. २. स्वामी विवेकानन्द द्वारा कही गयीं उक्तियाँ - भाग २ | Great Quotations By Swami Vivekananda-Part-2
  3. 3. स्वामी विवेकानन्द द्वारा कही गयीं उक्तियाँ - भाग ३ | Great Quotations By Swami Vivekananda - Part 3
अनमोल विचारों का विशाल संग्रह पढ़ें :

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