दैत्यों मे मैं "प्रह्रलाद" हूँ - रंगों के पर्व होली से जुडी पौराणिक कथा!!

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Why Holi Is Celebrated - The famous story of Bhakt Prahlad In Hindi

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"दैत्यों मे मैं प्रह्रलाद हूँ।" 

ये वाक्य भगवान श्री कृष्ण ने कुरुश्रेत्र मे महाभारत के युध्द के दौरान अर्जुन को, गीता का उपदेश देते हुए बताया था! इस बात का जिक्र हम इसलिए कर रहे हैं क्यूंकि होली का पर्व निकट है और होली का पर्व भक्त प्रह्लाद को याद किये बिना पूरा नहीं सो सकता

होली हम सारे देश में बड़ी धूम-धाम और उमंगों से मनाते हैं, इस पर्व को मनाने के पीछे की कथा बहुत पुरानी है लेकिन आज भी यह उतनी ही प्रांसगिक है जितना पहले हुआ करती थी।

वैसे तो सारे धर्मों के सभी पर्व सद्भाव और आपसी मेल-जोल के उद्देश्य से बनाए गए हैं। लेकिन फिर भी सभी पर्वों के पीछे एक विशेष प्रेरक प्रसंग होता है।

होली का त्योहार हिरण्यकश्यप के गुरूर को तोड़ने और उसके पुत्र भक्त प्रह्लाद की आस्था के विजय की कहानी है

गुरुकुल मे भक्त प्रह्लाद ने अपने भजन 
"राम नाम लड्डु,गोपाल नाम घीऊ।
 हरि नाम मिश्री घोर-घोर पीऊ"
से बहुत से बच्चो को अपने प्रभाव मे कर लिया था। जब ये बात प्रह्लाद के गुरु ने उनके पिता हिरण्यकश्यप को बताई, तब हिरण्यकश्यप अत्यंत क्रोधित हुआ क्यूंकि हरिण्यकश्यप स्वयं को भगवान मनाता था और भगवान का घोर विरोधी था और अपने प्रभाव के कारण उसने अपने राज्य में ईश्वरभक्ति पर पूरी तरह से पाबंदी लगा दी थी।

लेकिन स्वयं उसका पुत्र प्रहलाद परम ईश्वर भक्त निकला। हिरण्यकश्यप ने प्रहलाद को कठोर यातनायें भी दीं, उसने प्रह्लाद को पहाड़ की उँची चोटी से नीचे फेकवाया, हाथी से कुचलवाया पर श्री हरि विष्णु के कृपा से इनका कुछ नही बिगाड़ा जा सका और प्रह्लाद की भक्ति पर इन सब का कुछ असर नहीं हुआ  ।
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अंत में हर प्रकार से पराजित होकर हिरण्यकश्यप ने उन्हे मृत्युदंड देने का कठोर फैसला लिया और अपनी बहन होलिका से मदद मांगी। होलिका को ये वरदान प्राप्त था कि आग उसे जला नहीं सकती थी इसलिए होलिका भक्त प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठ गई, लेकिन अधर्म का साथ देने की वजह से होलिका जल गई और भक्त प्रह्लाद बच गए।

हिरण्यकश्यप को उसके पापों की सजा देने के लिए और उसका अंत करने के लिए भगवान स्वयं नृसिंह अवतार के रूप में पृथ्वी पर उतरे और अपने नखों से उसका पेट चीर कर उसका वध कर दिया। भक्त प्रह्लाद की आस्था और विश्वास की जीत ने अधर्म के ऊपर धर्म की एक बार फिर स्थापना की।

मान्यता है कि इसी घटना के चलते होली पर्व का आरंम्भ हुआ। एक प्रकार से यह पर्व इस  बात की भी याद दिलाता है कि ईश्वर उसी का साथ देता है जो सत्य व ईश्वरभक्ति में पूरी तरह से तल्लीन रहता है। होलिका का दहन समाज व मनुष्यगत बुराईयों के दहन का भी प्रतीक है। ये इश्वर के प्रति सर्मपण की भावना को और घनिष्ठ करता है।


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COMMENTS

BLOGGER: 3
  1. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  2. बहुत बढ़िया कहानी. इस तरह की कहानियां पढने में बहुत अच्छी लगती हैं.

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