दीपा करमाकर : अगरतला से रिओ ओलम्पिक तक का सफर !

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अपने मजबूत हौसले और बुलन्द इरादों से सब कुछ पाया जा सकता है, चाहे वो कितना भी कठिन क्यो न हो, ये बात साबित की है दीपा करमाकर ने। दीपा करमाकर का जन्म 9 अगस्त, 1993 मे अगरतला मे हुआ था। ये सुर्खियो मेँ तब आई जब इन्होनेँ पहली बार 2014 मे कॉमनवेल्थ गेम्स मे कांस्य पदक जीतकर,ऐसा करने वाली खेल के इतिहास मे प्रथम भारतीय महिला बनने का गौरव प्राप्त किया। और ये विश्व के उन पाँच चुनिँन्दा महिलाओ मे से एक है,जिन्होने सफलता पूर्वक प्रॉडुनोवा वॉल्ट को पुरा किया और साथ ही सबसे उच्चतम अंक बनाने का कीर्तिमान भी रचा।


इनके पिता एक कोच थे, तो इन्हे भी बचपन से ही खेलो से बहुत लगाव था। और इसीलिए मात्र 6 साल की उम्र से ही इन्होनेँ जिमनास्टींग की तैयारी शुरु कर दी। सन 2007 मे ये जूनियर नेशनल कम्पटीशन जलपॉइगुड़ी मे जीती जिसने इनके मनोबल को और बढ़ाया।

2007 से अब तक ये कुल 77 मेँडल जीत चुकी है, जिनमे 67 गोल्ड मेडल राज्य, राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्रीय चैम्पीयनशीप स्तर के हैं और और बाकी रजत और कांस्य पदक भी इन्ही तीनो स्तर के ही है। आज पुरे देश को इनपर गर्व है,प्रॉडुनोवा वॉल्ट मे इन्होने सबसे ज्यादा अंक बना कर विश्व रिकार्ड कायम किया है। दीपा बताती है की इन्होनेँ और इनके कोच बीएस नंदी की टीम ने प्रॉडुनोवा वॉल्ट करने की सोची, क्योंकि यह बहुत कठिन था। उन्हें पता था कि दुनिया में पांच लोग भी इसे ठीक से नहीं कर सकते और अगर इसे ठीक से किया, तो विश्व स्तर की प्रतियोगिताओं में अंक और मेडल हासिल करना करीब-करीब पक्का माना जा सकता है। कोच नंदी ने दीपा में हुनर और जज़्बा देखा, और लग गये उनके साथ तैयारी कराने मेँ। और आज रिजल्ट हम सबके सामने है।




इतनी मेहनत करने के बाद दीपा के कोच बीएस नंदी की लाजवाब कामयाबी के बावजूद वह द्रोणाचार्य पुरस्कार की लिस्ट में पिछली बार पिछड़ गए। उम्मीद करनी चाहिए कि सिस्टम अपनी इस ग़लती को इस बार सुधार लेगा।
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क्रिकेट के अलावा दूसरे खेलों में सुर्ख़ियां तभी बन पाती हैं अगर ओलिंपिक या एशियाड जैसी बड़ी प्रतियोगिताओं में किसी खिलाड़ी ने मेडल जीता हो, लेकिन दीपा ओलिंपिक्स के लिए क्वालिफ़ाई कर भी सुर्खियां बटोर रही हैं।
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राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सचिन तेंदुलकर से लेकर बॉलीवुड तक दीपा को बधाई देने वालों का तांता लग गया है। आज हर किसी को इनपे गर्व है,और आज ये भारतीय जिमनास्टिक का अन्तराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधित्व करती है। बचपन मे इनके पैर समतल थे,पर कड़ी मेहनत के सहारे इन्होने उसे ठीक किया और अपने लगन के दम पर आज इस मुकाम पर पहुँच गयी जो हम सब लोगो के लिए प्रेरणा का विषय है।

हम दीपा करमाकर को रिओ ओलम्पिक के लिए ढेरों शुभकामनाएँ देते हैं और हमें पूरी उम्मीद है कि रिओ ओलम्पिक में जिम्नास्ट का पहला मेडल देश को दिलाने में दीपा अवश्य सफल होंगी !

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