बस एक माँ है जो मुझसे ख़फ़ा नहीं होती ~ माँ ~ मुनव्वर राना!

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"लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती
बस एक माँ है जो मुझसे ख़फ़ा नहीं होती" 

इन चंद पंक्तियों ने आपके दिल को भी जरूर छुआ होगा।  इसी तरह के बेहतरीन शेरों से सजे पुस्तक " माँ " के सभी गजलों को हम कई भाग में प्रकाशित करेंगे, और इन्हे मातृ दिवस के उपलक्ष्य पर प्रकाशित करने से अच्छा मौका क्या होगा !

पुस्तक " माँ " महान शायर मुनव्वर राना की लिखी हुयी और हर माँ को सलाम करती हुयी अद्भुत ग़ज़लों का संग्रह है। इस पुस्तक के हर एक नज़्म के जरिये मुनव्वर राना ने माँ के लिए उनके वास्तविक प्रेम को जाहिर किया है।  ये शेर कोहिनूर हीरे की तरह युगों युगों तक जगमगाते रहेंगे।  
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अगर ये गजलें आपको भी पसंद आएं तो इसके प्रिंट संस्करण को  जरूर ख़रीदें क्यूंकि इस किताब की बिक्री से हासिल की गई तमाम आमदनी “माँ फ़ाउण्डेशन” की ओर से ज़रूरतमन्दों की इमदाद के लिए ख़र्च की जाएगी। 

इसे पुस्तक को आप अमेज़न से ऑनलाइन भी खरीद सकते हैं! इसे खरीदने के लिए पुस्तक के चित्र को क्लिक करें ! 






माँ ~ भाग 1 ~ मुनव्वर राना 


हँसते हुए माँ बाप की गाली नहीं खाते

बच्चे हैं तो क्यों शौक़ से मिट्टी नहीं खाते 


हो चाहे जिस इलाक़े की ज़बाँ बच्चे समझते हैं

सगी है या कि सौतेली है माँ बच्चे समझते हैं 



हवा दुखों की जब आई कभी ख़िज़ाँ की तरह

मुझे छुपा लिया मिट्टी ने मेरी माँ की तरह 



सिसकियाँ उसकी न देखी गईं मुझसे ‘राना’

रो पड़ा मैं भी उसे पहली कमाई देते 

सर फिरे लोग हमें दुश्मन-ए-जाँ कहते हैं
हम जो इस मुल्क की मिट्टी को भी माँ कहते हैं 

मुझे बस इस लिए अच्छी बहार लगती है
कि ये भी माँ की तरह ख़ुशगवार लगती है 

मैंने रोते हुए पोंछे थे किसी दिन आँसू
मुद्दतों माँ ने नहीं धोया दुपट्टा अपना 

भेजे गए फ़रिश्ते हमारे बचाव को
जब हादसात माँ की दुआ से उलझ पड़े 

लबों पे उसके कभी बददुआ नहीं होती
बस एक माँ है जो मुझसे ख़फ़ा नहीं होती 

तार पर बैठी हुई चिड़ियों को सोता देख कर
फ़र्श पर सोता हुआ बेटा बहुत अच्छा लगा


इस चेहरे में पोशीदा है इक क़ौम का चेहरा

चेहरे का उतर जाना मुनासिब नहीं होगा 



अब भी चलती है जब आँधी कभी ग़म की ‘राना’

माँ की ममता मुझे बाहों में छुपा लेती है 



मुसीबत के दिनों में हमेशा साथ रहती है

पयम्बर क्या परेशानी में उम्मत छोड़ सकता है 



पुराना पेड़ बुज़ुर्गों की तरह होता है

यही बहुत है कि ताज़ा हवाएँ देता है 

किसी के पास आते हैं तो दरिया सूख जाते हैं
किसी के एड़ियों से रेत का चश्मा निकलता है 

जब तक रहा हूँ धूप में चादर बना रहा
मैं अपनी माँ का आखिरी ज़ेवर बना रहा 

देख ले ज़ालिम शिकारी ! माँ की ममता देख ले
देख ले चिड़िया तेरे दाने तलक तो आ गई 

मुझे भी उसकी जदाई सताती रहती है
उसे भी ख़्वाब में बेटा दिखाई देता है 

मुफ़लिसी घर में ठहरने नहीं देती उसको
और परदेस में बेटा नहीं रहने देता 

अगर स्कूल में बच्चे हों घर अच्छा नहीं लगता
परिन्दों के न होने पर शजर अच्छा नहीं लगता
~ मुनव्वर राना

"माँ" ग़ज़ल संग्रह के दूसरे और तीसरे भाग को नीचे दिए गए लिंक पर पढ़ें :

  1. मैं घर में सब से छोटा था मेरे हिस्से में माँ आई ~ माँ ~ भाग 2 ~ मुनव्वर राना !
  2. सिर्फ़ इक काग़ज़ पे लिक्खा लफ़्ज़—ए—माँ रहने दिया ~ माँ ~ भाग 3 ~ मुनव्वर राना !
  3. मोहब्बत करते जाओ बस यही सच्ची इबादत है ~ माँ ~ भाग 4 ~ मुनव्वर राना !
  4. मुफ़्लिसी तुझ से बड़े लोग भी दब जाते हैं ~ माँ ~ भाग 5 ~ मुनव्वर राना !

  5. इश्क़ में राय बुज़ुर्गों से नहीं ली जाती ~ माँ ~ भाग 6 ~ मुनव्वर राना !



माँ को समर्पित अन्य रचनाएँ :

COMMENTS

BLOGGER: 2
  1. समझदारी की बातें
    अक्ल के पीछे लठ ले के घूमते घूमते और उससे दुश्मनी निभाते निभाते जब हम थक मजबूर हो गये तो हमने सोचा की हम अब कुछ समझदारी की बातें ही क्र ली जाएँ. पहले हम भगवान का नाम ही ले लें जो हमें आता ही नहीं है .
    हे भगवान ,हमारे देश में ज्ञानी लोग बड़े तेजस्वी हों,शूरवीर लोग शत्रुओं का नाश करने वाले हों ,हमारे देश में गएँ बहुत दूध देनेवाली हों .पशुधन बहुत हो और हमारे देश का आधार नारी भाग्यशालिनी हो ताकि हमारी स्वतंत्रता हमे जो प्राप्त नहीं है वह प्राप्त करा सके और जो कुछ प्राप्त है,उसकी रक्षा क्र सके,
    सीख
    माता पिता-ये तो जीवन में एक ही बार मिलते हैं। हम आज जो कुछ भी हैं इन्ही की वजह से ही हैं। हमें इस लायक बनाया कि हम शान से सिर उठा कर जी सकें। अगर यह लोग अपना आराम ही देखते तो हमारा कुछ नहीं बनता। हे सरजनहार हम और क्या लिखें ।
    १ झेले कष्ट अपार
    हमें दुनिया में लाया
    किए बहुत से त्याग
    हमें यहाँ तक पहुंचाया
    २ विफल हुए हम
    दुनिया ने जब जब ठुकराया
    बढ कर दिया सहारा
    हंस कर गले लगाया
    3 किये बहुत प्रयत्न
    हमें जीना सिखलाया
    तूफानों में रह अडिग
    हमें चलना सीधी राह बताया
    जीवन के हर उतराव चदाव में तुमने हमारा साथ दिया है.हमारी प्रगति को ही अपने जीवन का सर्वोचच लक्ष्य माना.हमें इस लायक बनाया कि हम समाज में स्वाभिमान से सर उठा क्र जी सकें. तुम्हारा आशीर्वाद ही जीवन की तपती धूप में शीतल छाया की तरह हमेशा हमारे साथ रहा है.-ashok

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