मोहब्बत करते जाओ बस यही सच्ची इबादत है ~ माँ ~ भाग 4 ~ मुनव्वर राना !

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मुझे खबर नहीम जन्नत बड़ी कि माँ लेकिन,
लोग कहते हैं कि जन्नत बशर के नीचे है। 

मुझे कढ़े हुए तकिये की क्या ज़रूरत है,

किसी का हाथ अभी मेरे सर के नीचे है


बुज़ुर्गों का मेरे दिल से अभी तक डर नहीं जाता,

कि जब तक जागती रहती है माँ मैं घर नहीं जाता

मोहब्बत करते जाओ बस यही सच्ची इबादत है,

मोहब्बत माँ को भी मक्का—मदीना मान लेती है

माँ ये कहती थी कि मोती हैं हमारे आँसू,

इसलिए अश्कों का का पीना भी बुरा लगता है

परदेस जाने वाले कभी लौट आयेंगे,

लेकिन इस इंतज़ार में आँखें चली गईं

शहर के रस्ते हों चाहे गाँव की पगडंडियाँ,

माँ की उँगली थाम कर चलना मुझे अच्छा लगा

मैं कोई अहसान एहसान मानूँ भी तो आख़िर किसलिए,

शहर ने दौलत अगर दी है तो बेटा ले लिया

अब भी रौशन हैं तेरी याद से घर के कमरे,

रौशनी देता है अब तक तेरा साया मुझको

मेरे चेहरे पे ममता की फ़रावानी चमकती है,

मैं बूढ़ा हो रहा हूँ फिर भी पेशानी चमकती है
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वो जा रहा है घर से जनाज़ा बुज़ुर्ग का,
आँगन में इक दरख़्त पुराना नहीं रहा

वो तो लिखा के लाई है क़िस्मत में जागना,
माँ कैसे सो सकेगी कि बेटा सफ़र में है

शाहज़ादे को ये मालूम नहीं है शायद,
माँ नहीं जानती दस्तार का बोसा लेना

आँखों से माँगने लगे पानी वज़ू का हम,

काग़ज़ पे जब भी देख किया माँ लिखा हुआ

अभी तो मेरी ज़रूरत है मेरे बच्चों को,

बड़े हुए तो ये ख़ुद इन्त्ज़ाम कर लेंगे

मैं हूँ मेरा बच्चा है खिलौनों की दुकाँ है,

अब कोई मेरे पास बहाना भी नहीं है

ऐ ख़ुदा ! तू फ़ीस के पैसे अता कर दे मुझे,

मेरे बच्चों को भी यूनिवर्सिटी अच्छी लगी

भीख से तो भूख अच्छी गाँव को वापस चलो,

शहर में रहने से ये बच्चा बुरा हो जाएगा

खिलौनों के लिए बच्चे अभी तक जागते होंगे,

तुझे ऐ मुफ़्लिसी कोई बहाना ढूँढ लेना है

ममता की आबरू को बचाया है नींद ने,

बच्चा ज़मीं पे सो भी गया खेलते हुए

मेरे बच्चे नामुरादी में जवाँ भी हो गये,
मेरी ख़्वाहिश सिर्फ़ बाज़ारों को तकती रह गई

बच्चों की फ़ीस, उनकी किताबें, क़लम, दवात,

मेरी ग़रीब आँखों में स्कूल चुभ गया

वो समझते ही नहीं हैं मेरी मजबूरी को,

इसलिए बच्चों पे ग़ुस्सा भी नहीं आता है

किसी भी रंग को पहचानना मुश्किल नहीं होता,

मेरे बच्चे की सूरत देख इसको ज़र्द कहते हैं

धूप से मिल गये हैं पेड़ हमारे घर के,

मैं समझती थी कि काम आएगा बेटा अपना

फिर उसको मर के भी ख़ुद से जुदा होने नहीं देती,

यह मिट्टी जब किसी को अपना बेटा मान लेती है

तमाम उम्र सलामत रहें दुआ है मेरी,

हमारे सर पे हैं जो हाथ बरकतों वाले

हमारी मुफ़्लिसी हमको इजाज़त तो नहीं देती,

मगर हम तेरी ख़ातिर कोई शहज़ादा भी देखेंगे

माँ—बाप की बूढ़ी आँखों में इक फ़िक़्र—सी छाई रहती है,

जिस कम्बल में सब सोते थे अब वो भी छोटा पड़ता है

दोस्ती दुश्मनी दोनों शामिल रहीं दोस्तों की नवाज़िश थी कुछ इस तरह,

काट ले शोख़ बच्चा कोई जिस तरह माँ के रुख़सार पर प्यार करते हुए

"माँ" ग़ज़ल संग्रह के दूसरे और तीसरे भाग को नीचे दिए गए लिंक पर पढ़ें :

सिर्फ़ इक काग़ज़ पे लिक्खा लफ़्ज़—ए—माँ रहने दिया ~ माँ ~ भाग 3 ~ मुनव्वर राना !

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