अश्रु धारा दीर्घ, बहे चक्षु से ~ अंकेश धीमान

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अश्रु धारा दीर्घ, बहे चक्षु से।
हृदय पीड़ा, सुना नहीं सकता।।

घर-घर में, रावण राक्षस बैठा।
राम राज्य ला नहीं सकता।।


लघु वस्त्र हुए, स्त्री के नूतन में।
लज्जा, उनकी बचा नहीं सकता।।

न हो मां, बहन, बेटी, सदन में।
हृदय पीड़ा भी सुना नहीं सकता।।

नूतन में मजबूर हैं, ये हाथ मेरे।
कुछ करने को, आतुर होते हैं।
त्राही-त्राही मची, विश्व पटल पर।
अधर्म, अनीति, अकेले मिटा नहीं सकता।

नूतन में वृद्धों के, अंग थर-थर कांपे
चक्षु आशा भी तो, लौटा नहीं सकता।।

हृदय कोमल पीड़ा विकट इतनी।
व्यर्थ में समय गवां नहीं सकता।।

नजरे मिलाँऊ, दुष्ट प्राणी से कैसे।
हाथ है खाली, उठा नहीं सकता।।

शहीद हो, भारत देश पर वीर मेरे।
स्वर्ग से अंतिम रेखा, दिखा नहीं सकता।।

लाछण लगाये, वीर तुम पर कोई तो?
पीड़ा तुम्हारी, हृदय सह नहीं सकता।।

नीर समाप्त हो विश्व पटल पर तो?
मानव-गंर्धव, खग-मगृ, पीड़ा बता नहीं सकता।।

शिक्षा-दीक्षा मलीन हुई, नूतन मेें इतनी।
ग्रंथों के उपदेश, सुना नहीं सकता।।

शक्ति दो नाथ हमें: ग्रहण, हिंद बढ़े।
स्वर्ण राष्ट्र हो, कोई रोक नहीं सकता।।


सर्वत्र हो, सुखद, सफल, सभी।
कामना, श्रेष्ट प्रभु, हम ये करते हैं।
मालिक चले, हम मिल जुल, कर सभी।
मानवता धर्म को, कोई झुठला नहीं सकता।।

अडिग रहें सर्वत्र पटल, भूधर मानिंद हम।
हमें कोई मानव धर्म से हिला नहीं सकता।।

अमुख अंकुरित हो अन्त: हृदय सर्वत्र सभी।
विकासशील से विकसित भारत देश हमारा।
कोई भी मां का कपूत, डिगा नहीं सकता।।

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पथिक के पद चले, पथ बडे कठिन हंै।
भ्रष्ट है गण यहां, ईमानदारी निम्र है।।

धनाढ्य को माफ सभी दरिद्र को दंड है।
समाज ही क्या, सांस लेना भी कठिन है।।

घूस का है प्रचलन, निष्पक्ष कर्म निम्र है।
मंहगाई है बड़ी, दरिद्र भविष्य कठिन है।।

बेकारी यहां, रोजगार मिलना कठिन है।
भरमार बुराई यहां, निर्मल समाज निम्र है।।

भ्रष्ट है राजनीति यहां, नीति धर्म निम्र है।
शूरवीर छोर यहां, सम्मान मिलना कठिन है।।

दूषित हुई समीर, शुद्घ समीर होना कठिन है।
वृद्धि है जनसंख्या , लगाम कसना कठिन है।।

अबला नारी व्यथा, सम्मान मिलना निम्र है
वृद्ध हुये अनाथ, सेवा भाव भी कठिन है।।

नशा वृद्धि यहां, हिंद नशा मुक्त कठिन है।
शक्ति दो नाथ: पथिक पथ हो सुदृढ़ सदा।
खत्म हो बुराई सभी, समीर भी तो मधुर हो।।

निष्पक्ष हो कर्म सभी, घूस खोरी भी बंद हो।
ईमानदारी हो परवारन, भ्रष्ट भविष्य बंद हो।।

सेवा भाव हो वृद्ध का, अकृत्य भी तो निम्र हो।
हो शुद्ध समीर महक, दूषित पवन भी बंद हो।।

सर्वत्र सम्मान नारी को, अपमान भी तो बंद हो।
घर-घर जन्मे राम, रावण भी तो सब भस्म हो।
सर्वत्र हो स्वच्छ भाव, ईष्या अन्य भी खत्म हो।।

मुक्त नशा हिंद हो हमारा, नशा भी तो भस्म हो।
हो निष्पक्ष न्याय यहां, भेद भाव भी खत्म हो।।

शूरो का सम्मान सदा, अपमान उनका खत्म हो।
पाबंद समय के हम, अलास्य भी  सदा भस्म हो।।

परवान हो अच्छाई सदा, बुराई भी तो खत्म हो।
नीति हो सर्व हितकारी, राजनीति भी बंद हो।।

सफाई के उपक्रम हो सदा, गंदगी भी तो खत्म हो।
पथिक के पद चले, पथ बडे निर्मल-सरल है।।


कवि  परिचय 
अंकेश धीमान, पुत्र: श्री जयभगवान
बुढ़ानामुजफ्फरगनर उत्तर प्रदेश

Email Id-licankdhiman@yahoo.com
licankdhiman@rediffmail.com


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