आलसस्य परम सुखम!

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प्राचीन काल से ही आलस को सामाजिक और व्यक्तिगत बुराई माना जाता रहा हैं. "जो सोवत हैं, वो खोवत हैं" जैसी कहावतो के माध्यम से आलसी लोगो को धमकाने और "अलसस्य कुतो विद्या" जैसे श्लोको के ज़रिये उनको सामाजिक रूप से ज़लील करने /ताने कसने के प्रयास अनंतकाल से जारी हैं. लेकिन फिर भी आज तक (चैंनल नहीं ) आलस और आलसियों का वजूद "सेट मैक्स चैनल" पर "सूर्यवंशम फिल्म" की तरह जस का तस बना हुआ है, जो ये दर्शाता हैं की बुराई का विरोध करने से वो ज़्यादा बढ़ती हैं। इसीलिए बुराइयो को कोसे नहीं बल्कि प्यार से पाले-पोसे और बड़ा होने पर उनके हाथ पीले और गाल लाल करके घर से विदा कर दे।

दरअसल हर युग में अवतरित हुए जरुरत से ज़्यादा (लेकिन आवश्यकता से कम ) "श्याणे-लोग" इस बात को समझने में नाकाम रहे हैं की आलस कोई दुर्गुण नहीं हैं बल्कि ये तो दुनियादारी और मोहमाया से मुँह मोड़ लेने (और हाथ-पैर तोड़ लेने) का एक आसान आध्यात्मिक तरीका हैं जिसमे व्यक्ति बिना किसी को तकलीफ दिए, बिना किसी "गिव या टेक" के,सारे प्रलोभनों को ओवरटेक करके,"सिक्स-लेन" वाले "मोक्ष मार्ग" पर बिना कोई टोल टैक्स दिए अपनी गाड़ी और कल्पनाओं के घोड़े दौड़ा सकता हैं. जिस दिन जालिम दुनिया ये समझ लेगी उसी दिन से सारी समस्याए नेताओ की ईमानदारी की तरह छू मंतर हो जाएगी।

आलसी लोगो को चाहे कोई कितना भी भला-बुरा क्यों ना कहे लेकिन वो उसका कभी बुरा नहीं मानते क्योंकि बुरा मानने के बाद गुस्सा उपजता हैं जो की झगड़े और कलह (और कलह से सुलह का रास्ता काफी दुर्गम होता हैं) को जन्म देता है जिससे रिश्तो में दरार आने की संभावना रहती हैं और इस दरार को रोकने के लिए वो "खम्बुजा - सीमेंट" की तरह काम करते हैं. टीवी विज्ञापनों में कई सीमेंट में जान बताई जाती हैं। ऐसे सारे विज्ञापन के खिलाफ ज्ञापन देने की ज़रूरत हैं क्योंकि दरअसल "जान" किसी सीमेंट में नहीं होती हैं बल्कि आलसी लोगो में होती हैं क्योंकि संबंधों के लिए वो अपना "अहम" त्याग देते हैं लेकिन अपना आलस त्याग देंगे ऐसा "वहम" किसी कीमत पर नहीं उपजने देते हैं।

आज के भौतिकतावादी युग में सामाजिक मूल्यों को बनाये रखने में आलसी महापुरुष अपनी महती भूमिका निभा रहे हैं क्योंकि जहाँ अधिकतर लोग सफलता मिलने के बाद बदल जाते हैं और इवन-डे पर अपनी मंहगी कार में और ओड-डे पर अपने अभिमान पर सवारी करने लगते हैं, वहीँ आलसी लोगो से सभ्य समाज को ऐसा कोई खतरा नहीं हैं क्योंकि काम और सफलता इन दो शब्दों से आलसी लोगो का वहीँ सम्बन्ध होता हैं जो की "लाल -किला बासमती चावल" से लाल किले का हैं लेखक और प्रकाशक की "सयुंक्त-गलती" से "काम और सफलता" जैसे शब्द आलसियों की डिक्शनरी में होते तो हैं लेकिन उन्हें देखते ही वो पेज पलट देते हैं ताकि उनकी किस्मत का पासा पलट पाये और वो आलस के अलावा किसी अभिमान या स्वाभिमान का शिकार हो पाये।

यहाँ पर ये "अस्पष्ट" कर देना ज़रूरी हैं की आलसी लोग किसी भी कार्य या मेहनत से नहीं घबराते हैं उनको केवल इस बात का डर सताता हैं की उनके काम करने से कहीं "सोने " के भाव कम ना हो जाये। ये लोग इतने दयालु और परहित स्वाभाव के होते हैं की हर क्षेत्र में बढ़ती हुई "गला-काट" प्रतिस्पर्धा को कम करने के उद्देश्य से काम ही नहीं करते हैं ताकि "काबिल" लोगो को मौका मिले और वे सफल होकर "ड्यू डेट" से पहले अपने सभी "बिल" भर सके। इसके बदले इनको किसी सम्मान की आशा नहीं होती बल्कि ये तो केवल इतना ही चाहते हैं की काबिल लोग अपनी सफलता का शोर मचा कर इनकी नींद ख़राब करे। इसके अलावा आलसी लोगो पर कभी अपेक्षाओं और उम्मीदों पर खरा ना उतर पाने का आरोप नहीं लगता क्योंकि सपने में भी इनसे कोई उम्मीद या अपेक्षा नहीं रखी जाती। ये कभी किसी का दिल भी नहीं तोड़ते क्योंकि इन्हे दिन-रात खटिया तोड़ने से ही फुर्सत नहीं मिलती।

आलसी लोग बिना दब के, कब के, समाज के हर तबके में अपनी पैठ सियाचिन की बर्फ की तरह जमा चुके हैं। बॉलीवुड में ऐसे कई आलसी (हीरो) भरे हुए है जो पूरे साल में केवल एक ही फिल्म करते लेकिन चूँकि वो बड़े लोग है इसीलिए उनके आलस को परफेक्शन की पैकिंग में बेच दिया जाता है। कुछ डायरेक्टर्स तो इतने आलसी होते हैं की फिल्म की स्क्रिप्ट सेलेक्ट करने में ही 3-4 साल निकाल देते हैं. वैसे ये डायरेक्टर्स हिम्मत करके थोड़ा आलस और दिखाए तो सरकारे पंचवर्षीय योजनाये बनाने और क्रियान्वित करने में भी इनकी मदद ले सकती हैं ताकि सरकार और उनके मंत्री संसद के अंदर और बाहर थोड़ा और आराम से सो सके.

लेखक परिचय :

अमित शर्मा (CA): पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट और कंपनी सेक्रेटरी। वर्तमान में एक जर्मन एमएनसी में कार्यरत। समसामयिक विषयों पर व्यंग लेखन 

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