द्रोण पर्व ~ महाभारत | Dron Parv ~ Mahabharat Stories In Hindi

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द्रोण पर्व में भीष्म के धराशायी होने पर कर्ण का आगमन और युद्ध करना, सेनापति पद पर द्रोणाचार्य का अभिषेक, द्रोणाचार्य द्वारा भयंकर युद्ध, अर्जुन का संशप्तकों से युद्ध, द्रोणाचार्य द्वारा चक्रव्यूह का निर्माण, अभिमन्यु द्वारा पराक्रम और व्यूह में फँसे हुए अकेले नि:शस्त्र अभिमन्यु का कौरव महारथियों द्वारा वध, षोडशराजकीयोपाख्यान, अभिमन्यु के वध से पाण्डव-पक्ष में शोक, संशप्तकों के साथ युद्ध करके लौटे हुए अर्जुन द्वारा जयद्रथवध की प्रतिज्ञा, कृष्ण द्वारा सहयोग का आश्वासन, अर्जुन का द्रोणाचार्य तथा कौरव-सेना से भयानक युद्ध, अर्जुन द्वारा जयद्रथ का वध, दोनों पक्षों के वीर योद्धाओं के बीच भीषण रण, कर्ण द्वारा घटोत्कच का वध, धृष्टद्युम्न द्वारा द्रोणाचार्य का वध।

द्रोणाचार्य के सेनापतित्व में अगले पाँच दिन के युद्ध का निर्णय

पितामह भीष्म के आहत होने पर आचार्य द्रोण को सेनापति बनाया गया। सेनापति बनने के बाद द्रोण ने प्रतिज्ञा की कि मैं भीष्म की तरह ही कौरव-सेना की रक्षा तथा पांडव-सेना का संहार करूँगा। मुझे केवल धृष्टद्युम्न की चिंता है, क्योंकि उसकी उत्पत्ति ही मेरी मृत्यु के लिए हुई है। दुर्योधन ने द्रोणाचार्य से प्रार्थना की कि यदि आप केवल युधिष्ठिर को पकड़ लें। तो युद्ध भी रुक जाएगा और जनसंहार भी न होगा।

युधिष्ठिर को पकड़ने का षड्यंत्र

द्रोणाचार्य ने वचन दिया कि मैं पूरी शक्ति से युधिष्ठिर को बंदी बनाने की कोशिश करूँगा पर इसके लिए अर्जुन को युधिष्ठिर के पास से हटाना होगा। इस पर त्रिगर्त देश के राजा सुशर्मा तथा संसप्तकों ने विश्वास दिलाया कि युद्ध के लिए अर्जुन को चुनौती देंगे और लड़ते-लड़ते अर्जुन को दूर ले जाएँगे। उधर पांडवों को कृष्ण ने कहा कि कल कर्ण भी युद्ध में भाग लेगा। अतः अब युद्ध छल-प्रधान होगा, इसलिए युधिष्ठिर की रक्षा का पूरा प्रबंध होना चाहिए। इस प्रकार ग्याहरवें दिन प्रातः काल दोनों सेनाएँ आमने-सामने आ डटीं।

ग्याहरवें दिन का युद्ध

आज के युद्ध में आचार्य द्रोणाचार्य सेनापति थे। इन्हीं के साथ दुर्योधन, दुशासन, जयद्रथ, कृतवर्मा, कृपाचार्य, अश्वत्थामा और कर्ण भी थे। पांडव-सेना में सबसे आगे अर्जुन थे। अर्जुन को देखकर त्रिगर्तराज सुशर्मा आगे बढ़े। अर्जुन ने सात्यकि को बुलाकर कहा कि आचार्य द्रोण की पूर्व रचना युधिष्ठिर को पकड़ने के लिए की गई है। तुम सावधान रहना। हमारी सेना का सेनापतित्व धृष्टद्युम्न कर रहे हैं, इससे आचार्य द्रोण डरे हुए हैं।

महाभारत की सम्पूर्ण कथा पढ़ें :


सुशर्मा और संसप्तकों ने तेज़ी से आगे बढ़कर अर्जुन को चुनौती दी। अर्जुन ने आचार्य द्रोण को नमस्कार करने के लिए दो तीर छोड़े। आचार्य ने अपने शिष्य को आशीर्वाद दिया। सुशर्मा अर्जुन को लड़ते-लड़ते काफ़ी दूर ले गए। शल्य ने भीम को रोका, कर्ण सात्यकि से जूझ पड़े तथा शकुनि ने सहदेव को ललकारा। युधिष्ठिर के साथ केवल नकुल रह गए। तभी यह अफवाह उड़ गई कि युधिष्ठिर पकड़े गए। धर्मराज के पकड़े जाने की खबर सुनकर अर्जुन तेज़ी से युधिष्ठिर के पास पहुँचे, अर्जुन ने देखा युधिष्ठिर सुरक्षित हैं। अर्जुन के आते ही आचार्य द्रोण ने युधिष्ठिर को पकड़ने की आशा छोड़ दी।

बारहवें दिन का युद्ध

आज फिर त्रिगर्तों ने अर्जुन को ललकारा और लड़ते-लड़ते उन्हें दूर ले गए। जब अर्जुन लड़ते-लड़ते उन्हें दूर ले गए। जब अर्जुन युधिष्ठिर की ओर लौटने लगे तो रास्ते में राजा भगदत्त ने हाथी पर सवार होकर अर्जुन का रास्ता रोक लिया और अपशब्द भी कहे। भगदत्त को मार डाला। इधर द्रोणाचार्य ने युधिष्ठिर को पकड़ने की बहुत कोशिश की। सत्यजित युधिष्ठिर के रक्षक थे। सत्यजित ने द्रोणाचार्य के घोड़े मार दिए तथा रथ के पहिए काट दिए। द्रोणाचार्य ने अर्धचंद्र बाण से सत्यजित का सिर काट दिया। सत्यजित के मरने पर युधिष्ठिर रण-क्षेत्र से लौट आए। रात को दुर्योधन ने द्रोण से कहा कि आपकी प्रतिज्ञा पूरी नहीं हुई। लगता है पांडवों के प्रति आपका स्नेह है, नहीं तो युधिष्ठिर को पकड़ लेना आपके लिए कोई बड़ी बात नहीं।

चक्रव्यूह की रचना

दुर्योधन की बात से द्रोणाचार्य क्षोभ से भर उठे। उन्होंने कहा कि हमने कोई कसर नहीं उठा रखी, पर अर्जुन अजेय है। कल हम चक्रव्यूह की रचना करेंगे। यदि अर्जुन को दूर ले जाया जाए तो युधिष्ठिर को पकड़ा जा सकता है, क्योंकि चक्रव्यूह का भेद केवल अर्जुन को ही पता है।

तेरहवें दिन का युद्ध, अभिमन्यु का वध

आज फिर त्रिगर्तों और संसप्तकों ने अर्जुन को ललकारा। अर्जुन उनका पीछा करते हुए बहुत दूर चले गए। उसी समय कौरवों के दूत ने युधिष्ठिर को चक्रव्यूह के युद्ध का संदेश पत्र दिया। युधिष्ठिर चिंतित हो गए। इसी समय अभिमन्यु ने आकर युधिष्ठिर को प्रणाम किया तथा बताया कि जब मैं माँ के गर्भ में था, पिताजी ने चक्रव्यूह के युद्ध का वर्णन किया था। मैं गर्भ से ही सुन रहा था। छः द्वारों तक के युद्ध का वर्णन मैंने सुना। सातवें द्वार के युद्ध सुनते-सुनते माँ को नींद आ गई। मैं इस युद्ध के लिए तैयार हूँ। युधिष्ठिर ने चक्रव्यूह भेदन का निमंत्रण स्वीकार कर लिया। माता सुभद्रा ने स्वयं अपने पुत्र को अस्त्र-शस्त्रों से सजाया पर अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा ने उन्हें रण-क्षेत्र में जाने को मना किया। अभिमन्यु ने अपनी पत्नी उत्तरा को समझाया और चक्रव्यूह के द्वार गए। चक्रव्यूह के पहले द्वार पर जयद्रथ थे। अभिमन्यु ने जयद्रथ पर बाण चलाया तथा व्यूह को भेदकर भीतर पहुँच गया। भीम तथा अन्य पांडव वीर भीतर न जा सके। अभिमन्यु ने दूसरे द्वार पर द्रोणाचार्य को, तीसरे पर कर्ण को तथा चौथे द्वार पर अश्वत्थामा को हटाकर पाँचवें द्वार पर बढ़ गया। कर्ण की सलाह पर सातों रथियों ने अभिमन्यु को घेर लिया। अभिमन्यु ने घोर संग्राम किया, पर चारों ओर से प्रहार होने पर वह घायल हो गया, उसका सारथी मारा गया, घोड़े भी घायल होकर गिर पड़े। वह तलवार लेकर आगे बढ़ा, पर उसकी तलवार कट गई। अब वह रथ का चक्र लेकर टूट पड़ा। तभी दुर्योधन- के पुत्र लक्ष्मण ने अभिमन्यु के सिर पर गदा फेंककर मारी। अभिमन्यु घायल हो गया, पर उसने वही गदा लक्ष्मण की ओर फेंकी। अभिमन्यु तथा लक्ष्मण दोनों के प्राण एक साथ निकल गए। कौरवों को अभिमन्यु के वध का हर्ष तथा लक्ष्मण की मृत्यु का शोक हुआ। अभिमन्यु की मृत्यु से पांडव शोक में डूब गए। यह समाचार पाकर सुभद्रा और उत्तरा विलाप करती हुई चक्रव्यूह के सातवें द्वार पर पहुँच गईं। सुभद्रा अपने पुत्र का सिर गोद में लेकर बिलख-बिलखकर रो पड़ी। उत्तरा ने सती होने की इच्छा प्रकट की पर उसके गर्भवती होने के कारण सुभद्रा ने मना कर दिया।
उस दिन के युद्ध त्रिगर्तों और संसप्तकों को पूरी तरह नष्ट करके अर्जुन लौटे तो चक्रव्यूह के युद्ध में अभिमन्यु के मारे जाने का समाचार मिला। वे अत्यंत व्याकुल हो उठे। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सांत्वना दी तथा कहा कि अभिमन्यु की मृत्यु का कारण जयद्रथ है, क्योंकि उसे शंकर से यह वरदान मिला हुआ है कि अर्जुन को छोड़कर बाकी चारों पांडव तुम्हें नहीं जीत सकते। इसीलिए उसे पहले द्वार पर रखा गया था कि भीम आदि चक्रव्यूह में प्रवेश न कर सकें। तब अर्जुन ने प्रतिज्ञा की कि कल सूर्यास्त से पहले यदि जयद्रथ का वध मैं नहीं कर सका तो अपना शरीर भी अग्नि को समर्पित कर दूँगा। अर्जुन की प्रतिज्ञा सुनकर जयद्रथ काँपने लगा। द्रोणाचार्य ने आश्वासन दिया कि वे ऐसा व्यूह बनाएँगे कि अर्जुन जयद्रथ को न देख सकेगा। वे स्वयं अर्जुन से लड़ते रहेंगे तथा व्यूह के द्वार पर स्वयं रहेंगे।

चौदहवें दिन का युद्ध, जयद्रथ का वध

इस दिन द्रोणाचार्य ने शकट व्यूह बनाया तथा जयद्रथ को बीच में रखा। अर्जुन आज बड़े आवेश में थे। उन्होंने द्रोणाचार्य से घनघोर युद्ध किया, पर जीत की आशा न देखकर उनकी बगल से व्यूह के भीतर प्रवेश कर गए। युधिष्ठिर ने अर्जुन की रक्षा के लिए सात्यकि तथा भीम को भेजा। इसी समय भूरिश्रवा ने सात्यकि पर हमला किया। वह सात्यकि को मारना चाहता था कि अर्जुन के बाणों से उसके हाथ कट गए। वह गिर पड़ा तथा सात्यकि ने उसका सिर काट दिया। देखते-ही-देखते सूर्य डूब गया। अर्जुन ने अपना गांडीव उतार लिया। दुर्योधन बहुत प्रसन्न था। अर्जुन के भस्म होने के लिए चिता बनाई गई। दुर्योधन ने अर्जुन के चिता में जलने का दृश्य देखने के लिए जयद्रथ को भी बुला लिया। अर्जुन बिना शस्त्रों के चिता पर चढ़ने लगे तो कृष्ण ने कहा कि क्षत्रिय अपने अस्त्र लेकर चिता पर चढ़ते हैं। जैसे ही अर्जुन ने अक्षण-तूणीर बाँधकर अपना धनुष लिया, तभी कृष्ण ने कहा-शत्रु सामने है, वह बादलों में छिपा है। कृष्ण के कहते ही अर्जुन का बाण छूटा तथा जयद्रथ का सिर आकाश में ले गया। कौरवों में गहरा शोक छा गया तथा पांडवों में हर्ष। अब पांडवों में अगले दिन के युद्ध का विचार होने लगा। कृष्ण ने कहा कि कल हो सकता है कर्ण अर्जुन पर इंद्र से मिली अमोघ शक्ति का प्रयोग करे।

घटोत्कच की मृत्यु

कृष्ण ने प्रस्ताव रखा कि भीम का पुत्र घटोत्कच राक्षसी स्वभाव का है। वह अँधेरे में भी भयंकर युद्ध कर सकता है। यदि वह कल रात के समय कौरवों पर आक्रमण करे तो कर्ण को उस पर अमोघ शक्ति चलानी होगी। घटोत्कच ने रात के अँधेरे में ही कौरवों पर हमला कर दिया। धूल से आकाश ढँक गया। वर्षा होने लगी, कंकड़-पत्थर आकाश से गिरने लगे। दुर्योधन घबराकर कर्ण के पास गया। कर्ण पहले तो टालते रहे, पर दुर्योधन को अत्यंत व्याकुल देखकर अमोघ शक्ति लेकर निकला तथा उसने घटोत्कच पर अमोघ शक्ति का प्रयोग कर दिया। घटोत्कच मारा गया, पर कर्ण को यह चिंता हुई कि अब उसके पास अर्जुन के वध के लिए कोई शक्ति नहीं रही।

पंद्रहवें दिन का युद्ध द्रोणाचार्य का निधन

रात के आक्रमण से कौरव बहुत क्रोधित थे। आज द्रोणाचार्य भी बहुत क्रोधित थे। उन्होंने हज़ारों पांडव-सैनिकों को मार डाला तथा युधिष्ठिर की रक्षा में खड़े द्रुपद तथा विराट दोनों को मार दिया। द्रोणाचार्य के इस रूप देखकर कृष्ण भी चिंतित हो उठे। उन्होंने सोचा कि पांडवों की विजय के लिए द्रोणाचार्य की मृत्यु आवश्यक है। उन्होंने अर्जुन से कहा कि आचार्य को यह समाचार देना कि अश्वत्थामा का निधन हो गया है। अर्जुन ने ऐसा झूठ बोलने से इंकार कर दिया। श्रीकृष्ण ने कहा कि अवंतिराज के हाथी का नाम अश्वत्थामा है, जिसे भीम ने अभी मारा डाला है। कृष्ण ने युधिष्ठिर के पास रथ ले जाकर कहा कि यदि द्रोणाचार्य अश्वत्थामा के मरने के बारे में पूछें तो आप हाँ कह दीजिएगा। अभी भीम ने अश्वत्थामा हाथी को मारा है। तभी चारों ओर से शोर मच गया कि अश्वत्थामा मारा गया। द्रोणाचार्य ने युधिष्ठिर से पूछा जिन्होंने कहा-हाँ। पर नर नहीं, कुंजर।
नर कहते ही कृष्ण ने ज़ोर से शंख बजा दिया, द्रोणाचार्य आगे के शब्द न सुन सके। द्रोण ने अस्त्र-शस्त्र फेंक दिए तथा रथ पर ही ध्यान-मग्न होकर बैठ गए। तभी द्रुपद-पुत्र धृष्टद्युम्न ने खड्ग से द्रोणाचार्य का सिर काट दिया। द्रोणाचार्य के निधन से कौरवों में हाहाकार मच गया तथा अश्वत्थामा ने क्रोध में आकर भीषण युद्ध किया, जिसके सामने अर्जुन के अतिरिक्त और कोई न टिक सका। संध्या हो गई थी, अतः लड़ाई बंद हो गई।
द्रोण पर्व के अन्तर्गत 8 (उप) पर्व और 202 अध्याय हैं। इन आठों (उप) पर्वों के नाम हैं-
  • द्रोणाभिषेक पर्व,
  • संशप्तकवध पर्व,
  • अभिमन्युवध पर्व,
  • प्रतिज्ञा पर्व,
  • जयद्रथवध पर्व,
  • घटोत्कचवध पर्व,
  • द्रोणवध पर्व,
  • नारायणास्त्रमोक्ष पर्व।

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