ओटिज्म (स्वालीनता) के कारण, निवारण एवं उपचार

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रोग का परिचय
वर्तमान के खान पान व प्रदूषित वातावरण ने मनुष्य को मानसिक बीमारियों या फिर कहें कि मनुष्य ने जान बूझ कर ऐसे विकारों को अपने अंदर उत्पन्न कर लिया है। जिसका खामियाजा हमारी भावी पीढिय़ों को किसी गंभीर बीमारी का शिकार होकर चुकाना पड़ रहा है। संतानों के स्वास्थ्य के बिगड़ते अनुपात को ध्यान में रखते हुये  खासकर महिलाओं को गर्भ अवस्था के दौरान ज्यादा सजग रहने की आवश्यकता है। आज हम बच्चों व बड़ों में बढ़ती ऑटिज्म की बीमारी पर ही चर्चा करने जा रहे हैं। हिन्दी में इसे आत्म विमोह या स्व परायणता या फिर स्वालीनता  के नाम से भी जाना जाता हैं।  ऑटिज़्म एक न्यूरो-डेवलपमेंटल डिस्ऑर्डर है। जिसके लक्षण बच्चों में बचपन से ही दिखाई देने लगते हैं। यह एक प्रकार का मानसिक विकार है, जो मस्तिष्क के साथ, रोगी के अन्य भागों को भी प्रभावित करता है।  इस प्रकार के रोग से पीडि़त बच्चों का शारीरक व मानसिक विकास सामान्य बच्चों की तुलना में कहीं कम होता है।  इस बीमारी के शिकार बच्चों के साथ बड़े भी है। संयुक्त राष्ट्र सभा ने 2 अप्रैल 2007 में ऑटिज्म रोग पर चिंता जाहिर करते हुये, विश्व ऑटिज्म दिवस मनाने की घोषणा की थी। ताकि विश्व की समस्त मानव जाती को ऑटिज्म के प्रति अधिक जागरूक करने का , एक सराहनीय कार्य किया जा सके। जागरूकता एक ऐसा विकल्प है, जिसके माध्यम से ऐसी बीमारियों को कुछ हद तक काबू किया जा सकता है। रोगियों में बीमारी से लडऩे के लिए उत्साह बढ़े, वर्ष 2013 में विश्व ऑटिज्म दिवस पर, उक्त रोग से ग्र्रसित व्यक्ति कृष्ण नारायणन द्वारा, लिखित पुस्तक से,  अलग ही आशा  शीर्षक पर   गीत जारी किया गया।  सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के अनुसार प्रति 110 में से एक बच्चा ऑटिज़्म ग्रस्त है और हर 70 बालकों में से एक बालक, इसी बीमारी से प्रभावित है। जिसकी संभावना बालिकाओं की अपेक्षा बालकों में अधिक पाई जाती है। ऑटिज्म की पहचान का कोई निश्चित तरीका अभी भी ज्ञात नहीं हो सका। लेकिन जल्द ही उक्त बीमारी से छुटकारा, व रोगी की स्थिति में कुछ हद तक सुधार लाया जा सकता है। क्योंकि इसी  लक्ष्य को लिये, वैज्ञानिक ऑटिज्म पर अध्ययन रत है।   
प्रभावित बच्चों में रोग के लक्षण  
  •  जब बच्चे की आयु 6 माह  से  एक वर्ष के मध्य है, तब ही अभिभावक द्वारा ऑटिज्म बीमारी के लक्षण देखे जा सकते हैं। उनको चाहिए कि बच्चे की,  कुछ गतिविधियों पर गौर करें, जैसे कि  क्या वह किलकारी भर रहा है या नहीं? क्या वह मुस्कुरा रहा है या नहीं? या किसी बात पर विपरीत प्रति क्रिया दे रहा है या नहीं? 
  •  ऐसे बच्चों में सामाजिक असमर्थाएं बचपन से ही हो जाती हंै, और बड़ा होने तक चलती रहती हैं।  ऐसे बच्चे समाज के प्रति, पूर्ण: उदासीन होते हैं, वो अन्य लोगों के प्रति कोई भी प्रतिक्रिया नहीं देते। 
  •  इस रोग से पीडि़त बच्चों में मुख्य: पाया जाता कि वो किसी भी व्यक्ति से आंखें नहीं मिलाते हैं। अपनी बात जाहिर करने के लिए  वो अक्सर दूसरे व्यक्ति का हाथ छूते, और हिलाते हैं।
  • इस रोग से ग्र्रसित बच्चों में  तीन से पाँच वर्ष की आयु में, सामाजिक ज्ञान की पूर्ण: कमी पाई जाती है, उन्हें पुकारने पर भी वो कोई प्रतिक्रिया शीघ्र नहीं दे पाते, ऐसे बच्चे ंंभावनाओं के प्रति अ संवेदनशील होते हैं।  
  •  उक्त रोग से ग्र्रसित बच्चों में सामाजिक विकास न होने के कारण, वे दूसरे बच्चों की बातों को समझने में, असमर्थ होते इसलिए, अन्य व्यक्तियों अथवा बच्चों द्वारा इन्हें गंभीरता से नहीं लिया जाता। 
  •  ऐसे रोगी हमेशा, अपनी दुनिया में ही खोए रहते हैं, उनके आसपास क्या चल रहा है, उन्हें उससे, कोई भी फर्क  नहीं पड़ता। 
  •  ऐसे बच्चे, हमेशा अपनी अजीब क्रियाओं को बार-बार दोहराते रहते हैं और अजीब सी आवाजें निकालने के साथ आगे-पीछे हिलना, हाथ को हिलाते रहना, जैसी हरकतें करते है।  
  • कभी-कभी वे सामने वाले व्यक्ति की आवाजों पर ध्यान नहीं देते, तथा उन्हें भाषा सीखने में परेशानी होती है।
  •  ऑटिस्टिक बच्चे तकलीफ के प्रति कोई क्रिया नहीं करते, तथा वे, उक्त तकलीफ से   बचने का भी कोई प्रयास नहीं करना चाहता।  
  •  औटिस्टिक बच्चे किसी व्यक्ति के,  आने या जाने से परेशान नहीं होते।
  • ऑटिज्म के रोगी को मिर्गी के दौरे भी पड़ सकते हैं।
  • इससे प्रभावित रोगी, सीमित और दोहराव युक्त व्यवहार करता है, जैसे एक ही काम को बार-बार दोहराना। 
  •   ऑटिज्म से ग्रस्त बच्चे छूने पर असामान्य बर्ताव करते हैं। जब उन्हें उठाया जाता है तो वे लिपटने के जगह लचीले पड़ जाते हैं, या तन जाते हैं। जीवन के पहले साल में वे सामान्य ढंग से विकसित नहीं हो पाते, जैसे की मां की आवाज पर मुस्कुराना ,दूसरों का ध्यान खिंचने के लिए, किसी भी वस्तु की तरफ इशारा करना, एक शब्द से बातचीत करना। इस तरह के बच्चों का व्यवहार, काफी असमानताओं की ओर इशारा करता है।उक्त कोई भी लक्षण बच्चों में नजर आने पर अभिभावकों को चाहिए कि, तुरंत ही किसी   अच्छे मनों चिकित्सक से संपर्क कर,  सलाह ले व निवारण के उपायों का अनु शरण करें।
बीमारी के कारण  
 उक्त रोग की कोई भी सटीक जानकारी अभी तक उपलब्ध नहीं है। किंतु यह अवश्य ज्ञात हुआ, कि अनु वांशिक  बदलाव मुख्य कारण  या ऐसा माना जाता है कि पर्यावरणीय बदलाव भी ऑटिज्म का कारण हो सकता हैं।   ऑटिज्म के कारक जन्मजात या जन्म के तुरंत बाद बच्चे को प्रभावित कर सकते हैं। गर्भ अवस्था के दौरान मां का किसी बीमारी से पीडि़त होना, गर्भवती महिला का डिप्रेसन में होना, समय से पहले 
प्रसव होना, मां में थायरॉइड की गड़बड़ी आदि से बच्चे के सेंट्रल नर्वस सिस्टम को नुकसान पहुंचता है। जन्म के समय शिशु को पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन न मिलना या गर्भावस्था के दौरान मां के गलत खानपान के चलते या कु पोषित रहने से भी बच्चा ऑटिस्टिक हो सकता है. 
 जागरूकता ही बचाव
  1. अभिभावकों को चाहिए कि ऐसे बच्चों को खेल-खेल में नए शब्दों का उच्चारण करायें। खिलौनों के साथ, खेलने का सही तरीका दिखाएं।
  2. ऐसे बच्चों की मानसिकता सुदृढ़ हो, बच्चों में बारी-बारी से खेलने की आदत डालें, धीरे-धीरे खेल में लोगों की संख्या को बढ़ाते जायें।
  3.  आप को चाहिए कि ऐसे बच्चों के सामने छोटे-छोटे वाक्यों में बात करें, और साधारण भाषा का प्रयोग कर, रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाले शब्दों को जोड़ कर, उन्हें बोलने के लिए प्रेरित करें।  
  4.  ऐसे बच्चों के उत्साहवर्धन के लिए, आप को चाहिए कि यदि बच्चा बोल पा रहा है, तो उसे शाबाशी दें व पुन: बोलने के लिए प्रेरित करें। बच्चे को अपनी जरूरतों के बारे व्याख्या का मौका अवश्य दें।
  5.  आप को चाहिए कि, बच्चा यदि  बोल नहीं पाए, तो उसे किसी चित्र  की ओर, इशारे से, अपनी जरूरतों के बारे में बोलना सिखाएं।
  6.  पीडि़त अभिभावकों को चाहिए कि ऐसे बच्चे को, तनाव मुक्त स्थानों जैसे- पार्क आदि में ले कर, जायें व अन्य बच्चे से बात करने के लिए सदैव प्रेरित करें।
  7. अभिभावक को चाहिए कि वे बच्चे के साथ, धीरे-धीरे कम समय से बढ़ाते हुए, अधिक समय के लिए हमेशा, नजर मिला कर बात करने की कोशिश करे। 
  8.  यदि रोग से ग्र्रसित बच्चा कोई, एक व्यवहार को दोहराता है , तो उसे रोकने के लिए, ऐसी गतिविधियों के लिए प्रेरित करे, जो उसे व्यस्त रखें, ताकि वह उक्त व्यवहार को दोहरा न सके।
  9.  अभिभावक को चाहिए कि, बच्चों द्वारा गलत व्यवहार दोहराने पर, बच्चे से कुछ ऐसा कार्य करवाए , जो उसे पसंद नहीं है। यदि बच्चा कुछ देर गलत व्यवहार न करे, तो उसे तुरंत प्रोत्साहित करते रहें।
  10. अभिभावक को चाहिए कि बच्चों के प्रोत्साहन के लिए रंग-बिरंगी, चमकदार तथा ध्यान आकर्षित करने वाली चीजों का प्रयोग करें।
  11.  अभिभावकों को ऐसी स्थिति में बड़ी सूज-बूझ के साथ काम लेना होगा।  बच्चे में अधिक गुस्सा या अधिक चंचल लता के लिए, बच्चे को अपनी शक्ति को, इस्तेमाल करने के लिए सही मार्ग दिखाए, जैसे की व्यायाम, दौड़, तथा बाहरी खेलों में रुचि, खेलों  में प्रतिस्पर्धा।  यदि वह बच्चा अधिक परेशानी महसूस करे, तो ,अभिभावकों की चिंता बढ़ जाना स्वाभाविक सी बात है।  ऐसे अभिभावकों चाहिए कि, विकट परिस्थिति में भी वे ईश्वर  पर विश्वास दृढ़ रखेे, अपने हौसले को कम ना होने दे।  उक्त रोग से पीडि़त बच्चों को किसी अच्छे मनों चिकित्सक को दिखाये। ऐसी स्थिति में चिकित्सक की दवाइयों के साथ-साथ  अभिभावकों को  ऑटिज्म से पीडि़त बच्चों के साथ कैसा व्यवहार होना चाहिए?   उनसे हमें कैसे संवाद साधना है?  ऐसे बच्चों को  बेहतर ढंग से कैसे समझाया जा सकता है.? जैसे विषय पर  डॉक्टर विस्तार से समझाते है। इस रोग से पीडि़त बच्चों को  स्पीच थेरैपी भी दी जाती है। वहां पर प्रोफ़ेशनल स्पीच थेरैपिस्ट्स बच्चों को संवाद साधना, व रोजमर्रा के काम करने की ट्रेनिंग भी देते हैं। हालांकि देश ऐसे केंद्र गिनती में ही मौजूद है।
लेखक परिचय:- अंकेश धीमान  बड़ौत रोड़ बुढ़ाना, मु.नगर
(धीमान इंश्योरेंस)

COMMENTS

BLOGGER: 2
  1. mujhe isi upchar ke bare me janna ta thank you sir.. aage bhi aisa hi accha accha post likhte rho...

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    1. श्री मान, प्रिय पाठक महोदय,
      आप की प्रतिक्रिया ने हमारे, हौसलों को एक नया आयाम देने की, सराहनीय कोशिश की, अधिक संबंधित जानकारी ग्रहण के लिए अपना प्यार सदा ऐसे ही लुटाते रहेगा, हम आप के सदा, आभारी रहेंगे। धन्यवाद सहित
      अंकेश धीमान

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