चाणक्य नीति काव्यानुवाद ~ अध्याय - 6

चाणक्य नीति काव्यानुवाद ~ अध्याय - 6, ये 20 गुण हैं बड़े काम के , अचूक सफलता बाण राम के । शुभ भविष्य , उज्जवल आशा , ये गुण नाशे सभी निराशा ।

चाणक्य नीति ~ अध्याय - 6 ~ काव्यानुवाद

रचनाकार -इन्जीनियर पशुपति नाथ प्रसाद


सुनकर दुर्बुद्धि हट जाती ,

सुनकर ज्ञान है मानव पाता ।

मोक्ष भी मिलता सुन सुन करके ,

सुनकर धर्म समझ में आता ।


पशुओं में कुत्ता चांडाल ,

खग में कौवा की यह चाल ।

सबसे बड़ा निंदक चांडाल ,

करे पाप मुनी में यह हाल ।


कांस्य पात्र करे राख सफाई ,

ताम्र पात्र इमली की खटाई ।

त्रिया शुद्धि रजस्वला से ,

धारा बेग से नदी सफाई  ।


राजा ,ब्राह्मण ,योगी आदि ,

भ्रमण करने वाला पूजित ।

भ्रमण करती जो है नारी ,

नष्ट भ्रष्ट बने कुबिचारी ।


जहां धन है मित्र बहुत है ,

बहुत है बंधु धनी अगर जन ।

जो है धनी कहाए  पंडित ,

श्रेष्ठ गिनाए जिसको है धन ।


जैसी भावी वैसी बुद्धि पाता है जन ,

वैसा ही उपाय सहायक मिलता उसको ।

जीवन का यह चक्र सदा ऐसा ही चलता ,

जिसकी जैसी चाह मिला वैसा ही उसको ।


काल चबाता है सब तन को ,

भक्षण करता है सब जन को ।

सोता जग , कभी काल न सोता ,

टाल सका कौन काल क्रम को ।


जन्म से अंधा , कामुक बंदा ,

धन लोलुप जन, मद में अंधा ।

स्वार्थ सिद्ध जन , नहीं देखता ,

परख न पाए दोष का धंधा ।


जीव स्वयं हीं कर्म है करता ,

फल उसका भी भोगे स्वयं ।

भ्रमण करता स्वयं जगत में ,

उससे मुक्त हो जाए स्वयं ।


राजा राज्य में किया हुआ अपने पापों को ,

पुरोहित राजा द्वारा किए पापों को ।

पति भोगे अपनी पत्नी के ही पापों को ,

भोगे गुरु शिष्य किया है उन पापों को ।


कर्जदार पिता है शत्रु ,

पुत्र मूर्ख अविचारी जो ।

रूपवती भार्या है शत्रु ,

माता गर व्यभिचारी हो ।


धन से लोभी वश में होता ,

नतमस्तक हो दंभी जन ।

जब जैसा तब तैसा मूर्ख जन ,

सत्य से वश हो पंडित जन ।


छोड़ो वह देश जो कुदेश से भी छोटा है ,

त्यागो वह मित्र जो कुमित्र से भी ओछा है ।

छोड़ो वह शिष्य जो कुशिष्य से भी पीछे है,

त्यागो वह नारी जो कुनारी से भी नीचे है ।


कुनृप देश में प्रजा न सुखी ,

बुरे मित्र न देते खुशी ।

बुरी हो पत्नी गृह सुख कैसा ,

मूर्ख शिष्य से यश हो जैसा ।


सिंह से एक , एक बगुला से ,

मुर्ग से चार , तीन गदहा से  ।

कौवा से गुण पांच परखिए ,

कुत्ता का गुण छ: निरखिए ।


कार्य बड़ा हो या छोटा हो ,

सिंह लगाकर पूरी शक्ति ।

सफल बनाता है वह उसको ,

एक सीख देती यह सूक्ति ।


संयम इंद्रियों पर रख करके ,

समझ देश काल ,अपना बल को ,

बगुला साधे सब कार्यों को ,

भाये यह एक गुण सफल को ।


जागना प्रातः ठीक समय पर ,

लड़ना लड़कर बंधु भगाए ।

झपट झपट कर भोजन करना ,

चार ये बातें मुर्ग सीखाए ।


मैथुन करना शांत एकांत में ,

समय-समय पर संग्रह करना ।

सावधान और चौकस रहना ,

पर विश्वास कभी न करना ।

5 गुण कौवा सीखलाए ,

बने चतुरजन जो अपनाए ।


बिन थके ही बोझा ढोना ,

नहीं देखना गर्मी शीत ।

रहे निरंतर संतोषी बन ,

बातें 3 गदहा से सीख ।


स्वामी भक्ति , अल्पाहारी ,

गहरी निद्रा ,रहना भूखा ,

जागे झटपट ,शूरवीरता ।

6 बातें सीखलाए कुत्ता ।


ये 20 गुण हैं बड़े काम के ,

अचूक सफलता बाण राम के ।

शुभ भविष्य , उज्जवल आशा ,

ये गुण नाशे सभी निराशा ।


+++ समाप्त +++

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