चाणक्य नीति काव्यानुवाद ~ अध्याय ~ 7

chanakya-neeti-kavyanuwad-chap7, तिल में तेल ,काठ में अग्नि , पय में घी ,गुड़ ईख में जैसे । गंध पुष्प में रहता है ज्यों , आत्मा बुद्धि तन में वैसे

चाणक्य नीति ~ अध्याय - 7 ~ काव्यानुवाद

रचनाकार -इन्जीनियर पशुपति नाथ प्रसाद


धन के नाश को , मन-संताप  को ,

त्रिया चरित्र को  , वचन नीच को ।

स्व अपमान को , विज्ञ जन जान को ,

नहीं है कहते , चुप ही रहते ।


धन- धान्य के लेनदेन में ,

विद्या संग्रह या भोजन में ।

व्यवहार में ,लाज त्याग दें ,

सुखी है बनते वे सब जन में ।


जो सुख शांति तृप्ति मिलते ,

संतुष्टि अमृत पीने में ।

वह सुख मिलता नहीं कदापि ,

धन पीछे व्याकुल जीने में ।


अपनी पत्नी ,अपना भोजन ,

व अपना धन ,इन तीनों में ।

पाता है संतुष्टि जो जन ,

रहता है सुख से जीवन में ।

इसके उल्टा दान , जप ,

अध्ययन इत्यादि इन तीनों में ।

संतोषी बनता, नहीं रहता है,

सुख से अपने जीवन में ।


बैल-हल व स्वामी-सेवक के,

विप्र द्वय के ,नर-नारी के ,

दो अग्नि के बीच नहीं जाएं ,

बुद्धिमान व्यक्ति कहलाएं ।


अग्नि ,गुरु ,विप्र , गौ , वृद्ध को ,

कन्या कुमारी , शिशु इन सब को  ।

पैर से छूना धर्म नहीं है ,

श्रेष्ठ मनुज का कर्म नहीं है ।


गज से दूर हजार हाथ ,

10 हाथ बैलगाड़ी से ।

हाथ सैकड़ा दूर अश्व से ,

त्याग देश शठ अनाड़ी से ।


विप्र आनंदित भोजन अन्न से ,

नाचे मयूर घन के गर्जन पे ।

सज्जन प्रसन्न पर धन पाने से ,

दुर्जन प्रसन्न पर दुख आने पे ।


गज अंकुश से , दुष्ट खड्ग से ,

चाबुक से अश्व आते वश में ।

लाठी करता श्रृंगी पशु वश

बिन भय प्रीत न आती कस में ।


व्यवहार अनुकूल शत्रु प्रबल से ,

प्रतिकूल शोभे दुर्जन अरि से ।

विनय से अथवा बल से जीतो ,

सामना हो गर तुल्य अरि से ।


बांहू के बल नृप बली हो ,

विप्र बली है जो ब्रह्मज्ञानी ।

रूप यौवन  और मधुरता ,

त्रिया बल  की मूल कहानी ।


अति सरलता भी न मंगलमय  ,

कटता सीधा वृक्ष ही जंगल में ।

टेढ़ा वृक्ष नहीं काटे कोई ,

बनना सरल न कभी दंगल में ।


जल जहां है बसे हंस जाके ,

सूखे सरोवर छोड़े  उगताके ।

जन जीवन नहीं हंस के जैसा ,

ग्राम जीवन नहीं बसता ऐसा ।


अर्जित धन की रक्षा व्यय है ,

बिन व्यय धन वह सड़ता वैसे ।

जिस सर में जल नया न भरता ,

जल पहले का सड़ता जैसे ।


चार चिन्ह है अंतर करता ,

स्वर्ग लोक से जन्मे जो जन ।

दानशीलता , मधुमय वाणी ,

ब्राह्मण तृप्ति व देव पूजन ।


क्रोध भयंकर , कुलहीन सेवा ,

नीच की संगति ,वैर स्वजन से ।

कर्कश वाणी , दीन घर जिनका ,

जन्में नर्क से लक्षण उनका ।


सिंह गुफा में जाने वाला ,

पाता है वह गजमुक्ता को ।

गीदड़ मांद में यात्री जाए ,

गधा चर्म बछड़ा पूंछ पाए ।


बिन विद्या का व्यर्थ है जीवन ,

पूंछ स्वान की रहती जैसे ।

नहीं गुदा को ढक सकती है ,

न मच्छर उड़ पाये उससे ।


वचन की शुद्धि , मन की शुद्धि

संयम इंद्रियों का व शुद्धि ।

दया जीवों पर , शुद्धि की शुद्धि ,

परमार्थी की ए है सिद्धि ।


तिल में तेल ,काठ में अग्नि ,

पय में घी ,गुड़ ईख में जैसे ।

गंध पुष्प में रहता है ज्यों ,

आत्मा बुद्धि तन में वैसे ।


+++ समाप्त +++

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