दूसरों से अपनी तुलना करना कैसे छोड़ें? अपने जीवन की गति को समझने की कला

दूसरों से अपनी तुलना करने की आदत हमें अपने ही जीवन से दूर कर देती है। जानिए तुलना छोड़कर अपने विकास और जीवन की सही दिशा पर ध्यान कैसे दें।

दूसरों से अपनी तुलना करना कैसे छोड़ें? अपने जीवन की गति को समझने की कला

दूसरों से तुलना छोड़कर अपने जीवन पर ध्यान देने की प्रेरणा


कभी-कभी हम बिना किसी वजह के उदास नहीं होते। वजह होती है—किसी और की जिंदगी को अपनी जिंदगी के सामने रख देना।

किसी की नौकरी लग गई। किसी ने अपना घर खरीद लिया। कोई विदेश चला गया। किसी की शादी हो गई। किसी ने अपना कारोबार शुरू कर दिया। कोई सोशल मीडिया पर लगातार सफल होता दिखाई दे रहा है।

और फिर हम चुपचाप अपनी जिंदगी की तरफ देखते हैं और मन में एक सवाल आता है—

“मैं अभी तक कहाँ पहुँचा?”

यहीं से तुलना शुरू होती है।

तुलना अपने आप में हमेशा गलत नहीं होती। किसी को देखकर प्रेरणा लेना अच्छी बात है। समस्या तब शुरू होती है जब हम दूसरे व्यक्ति की जिंदगी को अपने जीवन का पैमाना बना लेते हैं।

हर किसी की यात्रा एक जैसी नहीं होती

एक पेड़ और दूसरे पेड़ को देखकर हम यह तय नहीं करते कि कौन ज्यादा सफल है। आम का पेड़ आम देगा और नीम का पेड़ नीम। दोनों की प्रकृति अलग है, दोनों की गति अलग है और दोनों के फलने का समय भी अलग हो सकता है।

इंसान भी कुछ ऐसा ही है।

किसी को सफलता बहुत जल्दी मिल जाती है और किसी को उसी मुकाम तक पहुँचने में वर्षों लग जाते हैं। कोई पढ़ाई में अच्छा है, कोई कारोबार में, कोई कला में और कोई अपने परिवार को संभालने में।

लेकिन हम अक्सर केवल सामने दिखाई देने वाला परिणाम देखते हैं।

दूसरे व्यक्ति की कई साल की मेहनत हमें दिखाई नहीं देती। उसकी असफलताएँ, उसकी रातों की चिंता, उसके अधूरे प्रयास और उसके डर भी दिखाई नहीं देते। हमें केवल उसकी सफलता दिखाई देती है।

फिर हम अपनी पूरी कहानी की तुलना उसकी कहानी के एक चमकते हुए पन्ने से करने लगते हैं।

यह तुलना कभी न्यायपूर्ण नहीं हो सकती।

दूसरों से तुलना हमें अपने रास्ते से भटका देती है

मान लीजिए दो विद्यार्थी परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं। एक रोज दस घंटे पढ़ता है और दूसरा चार घंटे। अगर दूसरा विद्यार्थी लगातार पहले विद्यार्थी को देखकर परेशान होता रहे, तो उसका ध्यान पढ़ाई से हटकर चिंता पर चला जाएगा।

असल सवाल यह नहीं है कि दूसरा विद्यार्थी कितने घंटे पढ़ रहा है।

असल सवाल है—

“मैं कल से आज कितना बेहतर हुआ?”

यही सवाल जीवन में भी काम करता है।

अगर कल आपने एक घंटा पढ़ा था और आज डेढ़ घंटा पढ़ लिया, तो यह प्रगति है। अगर कल आप अपने गुस्से पर नियंत्रण नहीं रख पाए और आज प्रतिक्रिया देने से पहले कुछ क्षण रुक गए, तो यह भी प्रगति है। अगर कल किसी असफलता के बाद आप पूरा दिन टूटे रहे और आज कुछ समय बाद फिर अपने काम पर लौट आए, तो यह भी प्रगति है।

बड़ी उपलब्धियाँ अक्सर ऐसी ही छोटी-छोटी प्रगतियों से बनती हैं।

सोशल मीडिया ने तुलना को और कठिन बना दिया है

पहले हम अपने आसपास के कुछ लोगों से तुलना करते थे। अब हम घर बैठे हजारों लोगों की जिंदगी देख सकते हैं।

लेकिन सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली जिंदगी, पूरी जिंदगी नहीं होती।

किसी की सफलता की तस्वीर दिखाई देती है, उससे पहले की असफलताएँ नहीं। किसी की यात्रा दिखाई देती है, उस यात्रा की थकान नहीं। किसी का पुरस्कार दिखाई देता है, उसे पाने के लिए किए गए वर्षों के प्रयास नहीं।

इसलिए किसी की दिखाई हुई उपलब्धि की तुलना अपनी पूरी जिंदगी से करना अपने साथ अन्याय है।

तुलना का पैमाना बदलकर देखिए

अगली बार जब किसी की सफलता देखकर आपको लगे कि आप पीछे रह गए हैं, तो खुद से तीन सवाल पूछिए:

  1. क्या मैं वास्तव में पीछे हूँ या केवल किसी और की गति देख रहा हूँ?
  2. पिछले एक साल में मैंने क्या सीखा है?
  3. अगले छह महीनों में मैं अपने जीवन में कौन-सा एक छोटा बदलाव ला सकता हूँ?

तीसरा सवाल सबसे महत्वपूर्ण है।

क्योंकि तुलना आपका ध्यान दूसरों की तरफ ले जाती है, जबकि विकास आपका ध्यान अपने अगले कदम की तरफ ले जाता है।

हर सफलता का समय अलग होता है

किसी की कहानी देखकर अपने जीवन का अंतिम अध्याय तय मत कीजिए। आज की स्थिति हमेशा नहीं रहने वाली।

जिस व्यक्ति को आज आप बहुत आगे देखते हैं, वह भी कभी शुरुआत में था। और जिस व्यक्ति को आज आप पीछे समझ रहे हैं, उसके जीवन की कहानी अभी पूरी नहीं हुई है।

जीवन कोई ऐसी दौड़ नहीं है जिसमें सभी को एक ही समय पर एक ही जगह पहुँचना हो।

यह यात्रा है।

इसलिए सबसे जरूरी सवाल यह नहीं है कि “कौन मुझसे आगे है?”

बल्कि यह है—

“क्या मैं सही दिशा में चल रहा हूँ?”

अपने जीवन की तुलना अपने कल से कीजिए

आपके लिए एक सरल नियम हो सकता है:

आज मुझे किसी और से बेहतर नहीं बनना है। मुझे अपने कल से थोड़ा बेहतर बनना है।

अगर आपने आज कुछ नया सीखा, किसी पुरानी गलती को दोहराने से बच गए, अपने काम को थोड़ा बेहतर किया या किसी कठिन परिस्थिति में खुद को संभाल लिया, तो आपके दिन ने आपको कुछ दिया है।

हर बदलाव बड़ा और दिखाई देने वाला हो, यह जरूरी नहीं है।

कई बार जीवन में सबसे महत्वपूर्ण सुधार बाहर नहीं, भीतर होता है।

आज से एक छोटा अभ्यास शुरू कीजिए

आज रात सोने से पहले कागज पर केवल तीन बातें लिखिए:

  1. पिछले एक महीने में मैंने क्या सीखा?
  2. मैंने कौन-सी एक कठिनाई पार की?
  3. अगले तीस दिनों में मैं कौन-सा एक छोटा सुधार करूँगा?

बस इतना ही।

हर दिन अपने जीवन को थोड़ा बेहतर बनाने की कोशिश कीजिए। धीरे-धीरे आपको महसूस होगा कि जिस व्यक्ति से आपको सबसे ज्यादा प्रतिस्पर्धा करनी थी, वह कोई दूसरा नहीं था।

वह आपका कल वाला रूप था।

और शायद जीवन की सबसे स्वस्थ प्रतियोगिता यही है—

कल से बेहतर आज।


यह भी पढ़ें

श्रेणी: जीवन और आत्म-विकास | प्रेरक लेख

टैग: आत्म-विकास, आत्मविश्वास, सकारात्मक सोच, सफलता, तुलना, जीवन में सफलता, प्रेरक लेख, हिंदी मोटिवेशनल लेख

COMMENTS

BLOGGER
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE खोजें ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content