रामायण और महाभारत के 24 अमर वचन, मूल श्लोक, सरल हिंदी अर्थ और संदर्भ के साथ। कौन-सा वचन किसने, कब कहा और आज के जीवन में उसकी सीख।
रामायण और महाभारत को हमारी परंपरा "इतिहास" कहती है, यानी "ऐसा ही हुआ था" की कथा। इन दोनों ग्रंथों की एक ख़ास बात यह है कि इनकी सीख किसी उपदेशक की सूची में नहीं, पात्रों के मुँह से, किसी प्रसंग के बीच निकलती है। कहीं दुखी राम को लक्ष्मण संभालते हैं, कहीं लंका में थका हुआ हनुमान खुद को समझाता है, कहीं प्यासे युधिष्ठिर से यक्ष सवाल पूछता है।
इसीलिए इन वचनों को उनके प्रसंग के साथ पढ़ना ज़रूरी है। इंटरनेट पर घूमते बहुत-से "रामायण के अनमोल वचन" या तो बिना संदर्भ के हैं, या इन ग्रंथों के हैं ही नहीं। इस संग्रह में हर वचन के साथ मूल श्लोक, उसका संदर्भ, वक्ता और प्रसंग, और सरल हिंदी अर्थ दिया गया है।
संख्या के बारे में एक नोट: इन ग्रंथों के अलग-अलग संस्करणों में सर्ग, अध्याय और श्लोक की संख्या थोड़ी अलग हो सकती है। रामायण के श्लोकों की संख्या valmikiramayan.net पर दिए पाठ के अनुसार है। महाभारत के हर श्लोक के साथ हमने उस संस्करण का संकेत दिया है, जिससे संख्या ली गई है।
इस लेख में आप जानेंगे
- वाल्मीकि रामायण के 12 वचन: उत्साह, सत्य, मित्रता और जीवन के सत्य पर
- महाभारत के 12 वचन: यक्ष-प्रश्न, धर्म, वाणी और मन पर
- कौन-से प्रसिद्ध वचन इन ग्रंथों के नाम से गलत चलते हैं
वाल्मीकि रामायण के 12 अमर वचन
उत्साह और हिम्मत
1. उत्साह से बड़ा कोई बल नहीं
उत्साहो बलवानार्य नास्त्युत्साहात्परं बलम्।
सोत्साहस्य हि लोकेषु न किञ्चिदपि दुर्लभम्॥
(किष्किन्धाकाण्ड 4.1.121)
प्रसंग: सीता-हरण के बाद शोक में डूबे राम से लक्ष्मण कहते हैं।
अर्थ: हे आर्य, उत्साह बड़ा बलवान है, उत्साह से बढ़कर कोई बल नहीं। उत्साही व्यक्ति के लिए संसार में कुछ भी दुर्लभ नहीं।
आज के लिए: सबसे कठिन समय में साथ खड़ा व्यक्ति अक्सर यही याद दिलाता है कि हिम्मत बची है, तो रास्ता भी बचा है।
2. निराश न होना, सफलता की जड़
अनिर्वेदः श्रियो मूलमनिर्वेदः परं सुखम्।
अनिर्वेदो हि सततं सर्वार्थेषु प्रवर्तकः॥
(सुन्दरकाण्ड 5.12.10)
प्रसंग: लंका में बहुत खोजने पर भी सीता नहीं मिलतीं। निराशा घेरने लगती है, तो हनुमान खुद को समझाते हैं।
अर्थ: निराश न होना ही समृद्धि की जड़ है, यही परम सुख है। निराशा से बचा मन ही हर काम में आगे बढ़ाता है।
आज के लिए: हनुमान ने खुद से बात करके खुद को संभाला। कभी-कभी सबसे ज़रूरी उत्साह भीतर से आता है।
3. शोक जैसा कोई शत्रु नहीं
शोको नाशयते धैर्यं शोको नाशयते श्रुतम्।
शोको नाशयते सर्वं नास्ति शोकसमो रिपुः॥
(अयोध्याकाण्ड 2.62.15)
प्रसंग: राम के वन जाने के बाद, दुखी कौसल्या राजा दशरथ से कहती हैं।
अर्थ: शोक धैर्य को नष्ट करता है, शोक ज्ञान को नष्ट करता है, शोक सब कुछ नष्ट कर देता है। शोक के समान कोई शत्रु नहीं।
सत्य और धर्म
4. सत्य ही ईश्वर है
सत्यमेवेश्वरो लोके सत्यं पद्मा समाश्रिता।
सत्यमूलानि सर्वाणि सत्यान्नास्ति परं पदम्॥
(अयोध्याकाण्ड 2.109.13)
प्रसंग: चित्रकूट में ऋषि जाबालि राम को लौटकर राज्य संभालने के लिए तर्क देते हैं। राम पिता को दिए वचन से पीछे हटने से मना करते हुए यह कहते हैं।
अर्थ: संसार में सत्य ही ईश्वर है, लक्ष्मी भी सत्य के ही आश्रय में रहती है। सब कुछ सत्य पर टिका है, सत्य से ऊँचा कोई स्थान नहीं।
ध्यान दें: इंटरनेट पर इसका दूसरा पद अक्सर "सत्ये धर्मः समाश्रितः" लिखा मिलता है। valmikiramayan.net के पाठ में यह "सत्यं पद्मा समाश्रिता" है।
5. धर्म से ही अर्थ और सुख
धर्मादर्थः प्रभवति धर्मात्प्रभवते सुखम्।
धर्मेण लभते सर्वं धर्मसारमिदं जगत्॥
(अरण्यकाण्ड 3.9.30; कुछ संस्करणों में 3.9.31)
प्रसंग: वन में सीता राम से धर्म के बारे में बात करती हैं।
अर्थ: धर्म से धन उत्पन्न होता है, धर्म से सुख मिलता है, धर्म से सब कुछ प्राप्त होता है। यह संसार धर्म पर ही टिका है।
6. राम, धर्म का साकार रूप
रामो विग्रहवान् धर्मः साधुः सत्यपराक्रमः।
राजा सर्वस्य लोकस्य देवानां मघवानिव॥
(अरण्यकाण्ड 3.37.13)
प्रसंग: यह प्रशंसा किसी भक्त की नहीं, मारीच की है, जो रावण को सीता-हरण से रोकने की कोशिश कर रहा है।
अर्थ: राम धर्म के साक्षात रूप हैं, सज्जन हैं, सच्चे पराक्रमी हैं। जैसे देवताओं के राजा इंद्र हैं, वैसे ही राम सारे लोक के राजा हैं।
आज के लिए: किसी के चरित्र की सबसे बड़ी गवाही अक्सर उसके विरोधी से आती है।
वाणी और मित्रता
7. मीठा बोलने वाले बहुत, सही बोलने वाले कम
सुलभाः पुरुषा राजन् सततं प्रियवादिनः।
अप्रियस्य तु पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः॥
(अरण्यकाण्ड 3.37.2)
प्रसंग: मारीच, रावण को चेतावनी देते हुए।
अर्थ: हे राजन, हमेशा मीठा बोलने वाले लोग आसानी से मिल जाते हैं। पर अप्रिय लगने वाली हितकारी बात कहने वाला और उसे सुनने वाला, दोनों दुर्लभ हैं।
आज के लिए: रावण ने यह सलाह नहीं सुनी। सच कहने वाले जितने ज़रूरी हैं, उतने ही ज़रूरी सच सुन सकने वाले हैं।
8. सुख-दुख में मित्र ही सहारा
एष मे राम शोकान्तः शोकार्तेन निवेदितः।
दुःखितः सुखितो वापि सख्युर्नित्यं सखा गतिः॥
(किष्किन्धाकाण्ड 4.8.40)
प्रसंग: सुग्रीव राम को अपना दुख बताते हुए।
अर्थ: हे राम, शोक से पीड़ित मैंने अपने दुख की बात आपसे कह दी। मित्र चाहे दुखी हो या सुखी, उसका सहारा हमेशा उसका मित्र ही होता है।
जीवन का सत्य: चित्रकूट में भरत को राम का उत्तर
भरत चित्रकूट आकर राम से अयोध्या लौटने का आग्रह करते हैं। पिता की मृत्यु से दुखी भरत को राम जीवन के बारे में जो समझाते हैं, उसके चार श्लोक:
9. मनुष्य हर बात में स्वतंत्र नहीं
नात्मनः कामकारोऽस्ति पुरुषोऽयमनीश्वरः।
इतश्चेतरतश्चैनं कृतान्तः परिकर्षति॥
(अयोध्याकाण्ड 2.105.15)
अर्थ: मनुष्य अपनी इच्छा से सब कुछ नहीं कर सकता, वह हर बात का स्वामी नहीं। समय उसे कभी इधर, कभी उधर खींचता रहता है।
10. हर संचय का अंत है
सर्वे क्षयान्ता निचयाः पतनान्ताः समुच्छ्रयाः।
संयोगा विप्रयोगान्ता मरणान्तं च जीवितम्॥
(अयोध्याकाण्ड 2.105.16)
अर्थ: हर संचय का अंत क्षय में है, हर उत्थान का अंत पतन में। हर मिलन का अंत बिछड़ने में है, और जीवन का अंत मृत्यु में।
11. पके फल की तरह
यथा फलानां पक्वानां नान्यत्र पतनाद्भयम्।
एवं नरस्य जातस्य नान्यत्र मरणाद्भयम्॥
(अयोध्याकाण्ड 2.105.17)
अर्थ: जैसे पके फल को गिरने के सिवा कोई डर नहीं, वैसे ही जन्मे हुए मनुष्य को मृत्यु के सिवा कोई डर नहीं।
12. समुद्र में मिलती लकड़ियाँ
यथा काष्ठं च काष्ठं च समेयातां महार्णवे।
समेत्य च व्यपेयातां कालमासाद्य कंचन॥
(अयोध्याकाण्ड 2.105.26)
अर्थ: जैसे महासागर में बहती दो लकड़ियाँ आपस में मिल जाती हैं, और कुछ समय बाद फिर अलग हो जाती हैं, वैसे ही जीवन में लोगों का मिलना-बिछड़ना है।
आज के लिए: राम ये बातें दुख को बढ़ाने के लिए नहीं, भरत को शोक से उबारने के लिए कहते हैं। जो चीज़ें हमारे वश में नहीं, उन्हें स्वीकार करना ही आगे बढ़ने की पहली सीढ़ी है।
महाभारत के 12 अमर वचन
यक्ष-प्रश्न से
वनवास के दौरान प्यासे पांडव एक सरोवर पर पहुँचते हैं। सरोवर का स्वामी यक्ष कहता है कि पहले उसके प्रश्नों के उत्तर दो, फिर पानी पियो। चारों भाई बात नहीं मानते और अचेत हो जाते हैं। तब युधिष्ठिर एक-एक प्रश्न का उत्तर देते हैं। ये उत्तर महाभारत के सबसे प्रसिद्ध वचनों में हैं।
1. माता, पिता, मन और चिंता
माता गुरुतरा भूमेः पिता उच्चतरश्च खात्।
मनः शीघ्रतरं वायोश्चिन्ता बहुतरी तृणात्॥
(वनपर्व, क्रिटिकल एडिशन 3.297.41)
अर्थ: माता धरती से भारी (अधिक गौरवमयी) है, पिता आकाश से ऊँचे हैं। मन हवा से भी तेज़ है, और चिंताएँ घास के तिनकों से भी अधिक हैं।
2. क्या छोड़ने से क्या मिलता है
मानं हित्वा प्रियो भवति क्रोधं हित्वा न शोचति।
कामं हित्वार्थवान्भवति लोभं हित्वा सुखी भवेत्॥
(वनपर्व, क्रिटिकल एडिशन 3.297.57)
अर्थ: अहंकार छोड़ने से मनुष्य सबका प्रिय बनता है, क्रोध छोड़ने से उसे पछताना नहीं पड़ता। कामना छोड़ने से वह सचमुच धनी बनता है, और लोभ छोड़ने से सुखी।
3. सबसे बड़ा आश्चर्य
अहन्यहनि भूतानि गच्छन्तीह यमालयम्।
शेषाः स्थावरमिच्छन्ति किमाश्चर्यमतः परम्॥
(वनपर्व, यक्ष-प्रश्न का प्रचलित पाठ)
अर्थ: हर दिन प्राणी यमलोक जा रहे हैं, फिर भी बचे हुए लोग ऐसे जीना चाहते हैं मानो वे सदा रहेंगे। इससे बड़ा आश्चर्य क्या होगा?
4. संसार का सबसे बड़ा समाचार
अस्मिन्महामोहमये कटाहे सूर्याग्निना रात्रिदिवेन्धनेन।
मासर्तुदर्वीपरिघट्टनेन भूतानि कालः पचतीति वार्ता॥
(वनपर्व, यक्ष-प्रश्न का प्रचलित पाठ)
अर्थ: मोह से भरे इस संसार रूपी कड़ाहे में, सूर्य की आग और दिन-रात के ईंधन से, महीनों और ऋतुओं की करछी से चलाते हुए, काल सब प्राणियों को पका रहा है। यही सबसे बड़ा समाचार है।
5. सही मार्ग कौन-सा?
तर्कोऽप्रतिष्ठः श्रुतयो विभिन्ना नैको ऋषिर्यस्य मतं प्रमाणम्।
धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायां महाजनो येन गतः स पन्थाः॥
(वनपर्व, यक्ष-प्रश्न का प्रचलित पाठ)
अर्थ: तर्क की कोई स्थिर नींव नहीं, शास्त्र अलग-अलग बातें कहते हैं, और कोई एक ऋषि नहीं जिसका मत अंतिम हो। धर्म का तत्व गहरी गुफा में छिपा है। इसलिए जिस मार्ग पर महान लोग चले हैं, वही मार्ग है।
6. क्रोध और लोभ
क्रोधः सुदुर्जयः शत्रुर्लोभो व्याधिरनन्तकः।
सर्वभूतहितः साधुरसाधुर्निर्दयः स्मृतः॥
(वनपर्व, यक्ष-प्रश्न का प्रचलित पाठ)
अर्थ: क्रोध ऐसा शत्रु है जिसे जीतना बहुत कठिन है, लोभ ऐसा रोग है जिसका अंत नहीं। जो सब प्राणियों का हित चाहे वह साधु है, और जो निर्दय हो वह असाधु।
7. धर्म की रक्षा करो, धर्म रक्षा करेगा
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।
तस्माद्धर्मं न त्यजामि मा नो धर्मो हतोऽवधीत्॥
(वनपर्व, गीता प्रेस 3.313.128)
प्रसंग: यक्ष युधिष्ठिर से कहता है कि अपने भाइयों में से किसी एक को जीवित करवा लो। युधिष्ठिर भीम या अर्जुन नहीं, माद्री के पुत्र नकुल को चुनते हैं, ताकि कुंती और माद्री, दोनों माताओं का एक-एक पुत्र जीवित रहे।
अर्थ: नष्ट किया गया धर्म नष्ट करने वाले को ही नष्ट करता है, और रक्षा किया गया धर्म रक्षा करता है। इसलिए मैं धर्म नहीं छोड़ूँगा, कहीं नष्ट हुआ धर्म हमें नष्ट न कर दे।
धर्म और व्यवहार
8. जहाँ धर्म, वहाँ विजय
इत्युक्ते जानती सर्वमहं स्वं व्यसनागमम्।
अब्रुवं पुरुषव्याघ्र यतो धर्मस्ततो जयः॥
(स्त्रीपर्व, क्रिटिकल एडिशन 11.17.6)
प्रसंग: युद्ध के बाद गांधारी श्रीकृष्ण को बताती हैं कि युद्ध के दिनों में जब दुर्योधन उनसे विजय का आशीर्वाद माँगता था, तब वे उसे क्या उत्तर देती थीं।
अर्थ: यह सुनकर, आने वाली विपत्ति को जानते हुए भी, मैंने कहा था, हे पुरुषश्रेष्ठ: जहाँ धर्म है, वहीं विजय है।
आज के लिए: माँ ने बेटे को भी विजय का आशीर्वाद नहीं, सच कहा। "यतो धर्मस्ततो जयः" महाभारत में कई जगह आता है, और यही भारत के सर्वोच्च न्यायालय का ध्येय-वाक्य भी है।
9. धर्म का सार, एक वाक्य में
न तत्परस्य संदद्यात्प्रतिकूलं यदात्मनः।
एष संक्षेपतो धर्मः कामादन्यः प्रवर्तते॥
(अनुशासनपर्व, क्रिटिकल एडिशन 13.114.8)
अर्थ: जो व्यवहार अपने लिए अप्रिय हो, वह दूसरों के साथ न करें। संक्षेप में यही धर्म है; इससे अलग व्यवहार इच्छा से चलता है।
आज के लिए: दुनिया की कई परंपराओं में यह "सुनहरा नियम" मिलता है। महाभारत इसे धर्म का सार कहता है।
10. अहिंसा परम धर्म
अहिंसा परमो धर्मः सर्वप्राणभृतां स्मृतः।
(आदिपर्व 1.11.12; यही विचार वनपर्व और अनुशासनपर्व में भी)
अर्थ: सभी प्राणियों के लिए अहिंसा को परम धर्म माना गया है।
ध्यान दें: इस वचन के साथ जोड़ी जाने वाली पंक्ति "धर्म हिंसा तथैव च" के बारे में नीचे "परंपरा और प्रमाण" देखें।
वाणी और मन
11. वाणी के चार दर्जे
अव्याहृतं व्याहृताच्छ्रेय आहुः सत्यं वदेद्व्याहृतं तद्द्वितीयम्।
धर्मं वदेद्व्याहृतं तत्तृतीयं प्रियं वदेद्व्याहृतं तच्चतुर्थम्॥
(शान्तिपर्व, क्रिटिकल एडिशन 12.288.38)
अर्थ: बोलने से न बोलना श्रेष्ठ कहा गया है। बोलना ही हो, तो सत्य बोलना दूसरा दर्जा है, धर्मसम्मत बोलना तीसरा, और प्रिय बोलना चौथा।
आज के लिए: सोशल मीडिया के दौर में पहला दर्जा सबसे कठिन है: हर बात पर बोलना ज़रूरी नहीं।
12. इच्छाएँ भोग से शांत नहीं होतीं
न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति।
हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते॥
(आदिपर्व, ययाति प्रसंग)
प्रसंग: राजा ययाति, जिन्होंने अपने पुत्र पुरु से उसकी जवानी लेकर वर्षों भोग किया, अंत में यह निष्कर्ष कहते हैं।
अर्थ: इच्छाएँ भोगने से कभी शांत नहीं होतीं। जैसे घी डालने से आग और भड़कती है, वैसे ही वे और बढ़ती जाती हैं।
परंपरा और प्रमाण: इन ग्रंथों के नाम से चलते वचन
| प्रचलित बात | जाँच में क्या मिला |
|---|---|
| "अहिंसा परमो धर्मः, धर्म हिंसा तथैव च" महाभारत का पूरा श्लोक है | आंशिक रूप से। "अहिंसा परमो धर्मः" महाभारत में कई जगह है (जैसे आदिपर्व 1.11.12, अनुशासनपर्व 13.116.1)। पर जिन प्रसंगों को हमने देखा, उनमें "धर्म हिंसा तथैव च" वाला पद हमें नहीं मिला। |
| "जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी" वाल्मीकि रामायण का है | संदिग्ध। संस्कृत विद्वानों की एक चर्चा में बताया गया है कि यह पंक्ति रामायण के क्रिटिकल एडिशन और कई मुद्रित संस्करणों में नहीं मिलती; केवल कुछ संस्करणों (जैसे 1930 का एक मद्रास संस्करण) में मिलती है। इसका मूल स्रोत अब भी विवादित है। |
| "सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्" महाभारत का वचन है | प्रमाण नहीं। यह श्लोक मनुस्मृति (4.138) का बताया जाता है। महाभारत में वाणी पर इससे मिलता-जुलता विचार ऊपर वाला श्लोक (शान्तिपर्व 12.288.38) है। |
| "धर्मो रक्षति रक्षितः" केवल मनुस्मृति का है | आंशिक रूप से। यह मनुस्मृति (8.15) में है, पर यही पंक्ति महाभारत के वनपर्व (यक्ष-प्रश्न) और अनुशासनपर्व में भी मिलती है। |
परंपरा को सम्मान दें, पर प्रमाण से परखें।
संक्षेप में
उत्साह और निराश न होना, दोनों ग्रंथों की पहली सीख है।
सत्य और धर्म को दोनों ने सबसे ऊपर रखा।
सच कहने वाले के साथ सच सुनने वाला भी चाहिए।
जो वश में नहीं, उसे स्वीकारना भी बुद्धिमानी है।
सुविचार
वचन वही अमर है, जो अपने प्रसंग के साथ याद रखा जाए।
आपसे एक सवाल: इन 24 वचनों में से कौन-सा आपके मन को सबसे ज़्यादा छू गया, और क्यों? नीचे टिप्पणी में बताइए। आपकी अनुमति से कुछ उपयोगी जवाब दर्पण पत्र में साझा किए जा सकते हैं।
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रामायण और महाभारत की कथाएँ हिंदी साहित्य दर्पण पर मुफ़्त पढ़ी जा सकती हैं। जो पाठक पूरी कथा को एक जगह, क्रम से और विस्तार से पढ़ना चाहते हैं, उनके लिए हमारी ई-बुक उपलब्ध हैं। आपके साथ के लिए धन्यवाद।
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लेखक: HSD संपादकीय टीम
प्रकाशित: 03-Nov-2026
अंतिम समीक्षा/अद्यतन: 03-Nov-2026
स्रोत और संदर्भ
- वाल्मीकि रामायण, मूल पाठ और अनुवाद: valmikiramayan.net, अयोध्याकाण्ड सर्ग 109, अयोध्याकाण्ड सर्ग 105, अयोध्याकाण्ड सर्ग 62, किष्किन्धाकाण्ड सर्ग 8, सुन्दरकाण्ड सर्ग 12
- वेदपथ, वाल्मीकि रामायण: अरण्यकाण्ड सर्ग 37, अरण्यकाण्ड सर्ग 9, अयोध्याकाण्ड सर्ग 62
- महाभारत, क्रिटिकल एडिशन पाठ: स्त्रीपर्व 11.17.6, अनुशासनपर्व 13.114.8, शान्तिपर्व 12.288.38
- यक्ष-प्रश्न, मूल पाठ और अनुवाद (हरि रविकुमार): प्रेक्षा, भाग 2, भाग 4
- "धर्मो रक्षति रक्षितः" के स्रोत: Wikipedia; "अहिंसा परमो धर्मः" के स्थान: Hindupedia
- "जननी जन्मभूमिश्च" पर संस्कृत विद्वानों की चर्चा: Samskrita समूह
- ययाति का वचन: वेदपथ, आदिपर्व

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