विदुर नीति -अध्याय १ - मूर्ख कौन कहलाते है ? || Vidur Neeti - Chapter 1- WHO IS FOOL ?

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विदुर नीति -अध्याय १ - मूर्ख कौन कहलाते है ?

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बिना ज्ञान के ही धमंड में चूर रहने वाले, दरिद्र होकर भी बड़े-बड़े मंसूबे बांधने वाले, और बिना परिश्रम के ही धनवान बनने की इच्छा रखने वालों को, बुद्धिमान लोग मूर्ख समझते हैं।  

जो अपना काम छोड़ कर, दूसरों के कर्त्तव्य पालन में लगा रहता हैं तथा मित्रों के साथ गलत कार्यों में संलग्न रहता है; वह मूर्ख कहलाता है।

जो न चाहनेवाली चीजों की इच्छा करता है, और चाहने वाली चीजों से मुह फेर लेता है, और अपने से शक्तिशाली लोगों से दुश्मनी मोल लेता है ; वह मूर्ख आत्मा कहलाता है।  


जो शत्रु को मित्र बनाता है, और मित्र से ईर्ष्या - द्वेष करते हुए उसे दुःख पहुंचाता है तथा हमेशा बुरे कर्मों को ही आरम्भ करता है वह मूर्ख विचार वाला कहलाता है।  
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हे भरत कुल श्रेष्ट (ध्रितराष्ट्र), जो अपने कार्यों के भेद खोल देता है, और हर चीज में शक करता है, और जिन कार्यों को करने में कम समय लेना चाहिए उन्हें करने में अत्यधिक समय लगाता है; मूर्ख कहलाता है।  


जो पितरों का श्राद्ध नहीं करता है और न ही देवताओं की पूजा- अर्चना करता है, और न ही सज्जनों से मित्रता करता है, वह मूर्ख विचारों वाला कहलाता है।  

जो बिन बुलाये ही किसी सभा / स्थान पर पहुँच जाता है और बिना पूछे ही बोलता रहता है तथा अविश्वसनीय लोगों पर भी विश्वास कर लेता है, मूर्ख है।  


जो स्वयं गलती करके भी आरोप दूसरों पर मढ़ देता है, और असमर्थ होते हुए भी क्रोधित हो जाता है, मूर्ख कहलाता है।  

जो अपनी ताकतों और क्षमताओं को न पहचानते हुए भी धर्म और लाभ के विपरीत जाकर न पा सकने  वाली वस्तु की कामना करता है, वह व्यक्ति इस संसार में मूर्ख कहलाता है।  

हे राजन, जो किसी को अकारण ही दंड देता है और अज्ञानियों के प्रति भी श्रद्धा से भरा रहता है तथा कंजूसों और कृपणों का आश्रय लेता है, उसे मूढ़चित्त वाला कहा जाता है।  



विदुर नीति की अन्य कड़ियाँ 

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COMMENTS

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  1. ��|| सब जग ईश्वररूप है ||��
    सब कुछ भगवान ही है- यह गीता का सर्वश्रेष्ठ सिद्धान्त है और इसका अनुभव करने वाले को भगवान ने अत्यन्त दुर्लभ महात्मा कहा है
    वासुदेव: सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ: || ( गीता ७/१९ )
    श्रीमद्भागवत में भगवान ने कहा है
    अयं हि सर्वकल्पानां सध्रीचीनो मतो मम |
    मद्वाव: सर्वभूतेषु मनोवाक्यायवृत्तिभि: || ( ११/२९/१९)
    " मेरी प्राप्ति के जितने साधन है उनमें मैं सबसे श्रेष्ठ साधन यही समझता हूँ कि समस्त प्राणियों और पदार्थों में , मन ,वाणी , तथा शरीर के वर्ताव में मेरी ही भावना की जाये | "
    उपनिषदों में इस बात को समझने के लिये तीन द्रष्टान्त दिये गये है- सोने का , लोहे का , और मिट्टी का | जैसे सोने के अनेक गहने होते है , उन गहनों की आकृति ,नाम , रूप , तौल, उपयोग , मूल्य आदि अलग अलग होने पर भी उसमें सोना एक ही होता है | लोहे के अनेक अस्त्र - शस्त्र होते है , पर उनमें लोहा एक ही होता है | मिट्टी के अनेक बर्तन होते है पर उनमें मिट्टी एक ही होती है |
    ऐसे ही भगवान से उत्पन्न हुई स्रष्टि में अनेक प्राणि , पदार्थ आदि होने पर भी उसमें भगवान एक ही है |
    सोने से बने हुये गहने , लोहे से बने अस्त्र- शस्त्रों तथा मिट्टी से बने बर्तनों में कृमश: सोना , लोहा , मिट्टी प्रत्यक्ष दीखते है , परन्तु परमात्मा से बने हुये संसार में परमात्मा प्रत्यक्ष नहीं दीखते |
    इसलिये सब कुछ परमात्मा ही है इस बात को समझने के लिये गैहूँ के खेत का द्रष्टान्त दिया जाता है |
    किसान लोग गैहूँ की हरी भरी खेती को गैहूँ ही कहते है | खेती को गाय खा जाती है तो वे कहते है कि तुम्हारी गाय हमारा गैहूँ खा गयी जब कि गाय ने गैहूँ का एक दाना भी नहीं खाया ! खेत में भले ही गैहूँ का एक दाना भी दिखायी न दे , पर यह गैहूँ है - इसमें किसान को किचिंमात्र भी संदेह नहीं होता है | कोई शहर में रहने वाला व्यापारी हो तो वह उसको गैहूँ नही मानेगा परन्तु किसान यही कहेगा कि आरम्भ में वीज के रूप में गैहूँ था और अन्त में भी इससे गैहूँ ही निकलेगा , अत: बीच में खेती रूप से दीखने पर भी यह गैहूँ ही है जो आरम्भ और अन्त में होता है , बह बीच में भी होता है यह सिद्धान्त है
    " यस्तु यस्यादिरन्तच्श्र स वै मध्यं च तस्य सन् |" ( श्रीमदभागवत ११/२४/१७)
    भगवान सम्पूर्ण स्रष्टि के आदि बीज है
    यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन |
    न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम् || ( गीता १०/३९ )
    " हे अर्जुन ! सम्पूर्ण प्राणियों का जो बीज ( मूल काँरण ) है , बह बीज मै ही हूँ , क्यों कि वह चर अचर कोई प्राणी नहीं है , जो मेरे विना हो अर्थात चर अचर सब कुछ मैं ही हूँ |"
    ( स्वामीश्रीरामसुखदास जी महाराज के प्रवचन से )
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  2. सब ईश्वरमें है। मेरा स्वरुप प्राण है। मै अत्मा हुं। आत्मा सुखका स्वरुप है।

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